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मध्यम वर्ग को चाहिए अपनी एक पार्टी

टोनी जोसेफ | Dec 31, 2012, 00:48AM IST
 
 

अनुभव बताते हैं कि जब मध्यम वर्ग खेल में उतरता है तो लोकतंत्र में मजबूती आती है और शासन भी सुधरता है।
 
वर्ष  2012 के अंत में यह साफ है दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उबाल पर है। देशभर में लोग सड़कों पर उतरते हुए शासन-व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश का इजहार कर रहे हैं और ऐसा करने में उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक दलों को दरकिनार कर दिया है। वे खुद को हरसंभव बेहतर तरीके से संगठित करते हुए यह साफ संदेश दे रहे हैं कि मौजूदा पार्टियों पर उन्हें कोई भरोसा नहीं है।
लेकिन उन्हें भरोसा क्यों नहीं है? पिछले कुछ वर्षो में ऐसा क्या हुआ है, जिससे लोग खफा हैं?
 
इसका सबसे आकर्षक व आम जवाब तो यह है कि शासन बद से बदतर होता जा रहा है और लोगों का गुस्सा इसी का नतीजा है। लेकिन रोग की यह पहचान जांच के आगे नहीं ठहरती। हर मापने योग्य मानदंड पर पिछले एक-दो दशक में स्थितियां बिगड़ने की बजाय सुधरी ही हैं। पहले से कहीं ज्यादा तेज गति से हमारी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है और गरीबी की दर गिर रही है।
 
इस साल मार्च में खत्म हुई ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था सालाना 7.9 फीसदी दर से बढ़ी, जबकि गरीबी में वार्षिक तौर पर २ फीसदी गिरावट आई। और ये दोनों ही रिकॉर्ड उपलब्धियां हैं।
 
तो कानून-व्यवस्था की क्या स्थिति है? क्या सब जगह हिंसा बढ़ रही है? ऐसा नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 1991 और 2011 के मध्य हिंसक अपराधों की संख्या 4 फीसदी बढ़ते हुए 246,000 से 256,000 तक पहुंच गई। जबकि इसी अवधि में हमारी जनसंख्या में 40 फीसदी से ज्यादा इजाफा हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रति 100,000 लोगों पर अपराध की घटनाएं बढ़ने की बजाय घट ही रही हैं।
 
और भ्रष्टाचार के बारे में क्या कहें? क्या यह बेकाबू हो रहा है? हमारे पास वर्षो का ऐसा कोई तुलनात्मक आंकड़ा नहीं है, जिससे इस संदर्भ में निर्णायक जवाब मिल सके। एक लिहाज से यह साफ है कि हमारी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था अवैध धन बनाने के ज्यादा बड़े अवसर मुहैया करा रही है और इसलिए भ्रष्टाचार से जुड़ी रकम भी बड़ी हो रही हैं। लेकिन इसके साथ-साथ जिसे भी सत्तर-अस्सी का दशक याद हो, वह कदाचित ही यह कह सकता है कि भ्रष्टाचार लाइसेंस-राज के उस जमाने की तुलना में ज्यादा व्यापक है, जब राजनेताओं व नौकरशाहों को घूस दिए बगैर आप उंगली भी नहीं हिला सकते थे।
 
लिहाजा हालात की तार्किक समीक्षा करने पर लगता है कि आज सबसे अधिक नाटकीय बदलाव  शासन-व्यवस्था की गुणवत्ता में नहीं हो रहा है, जो पहले से बेहतर होने पर भी शर्मनाक तरीके से खराब है। बल्कि यह जबर्दस्त बदलाव तो लोगों के आक्रोशित होने और उस आक्रोश के मुताबिक तत्परता से कार्रवाई करने की क्षमता में हो रहा है। यह ऐसा है मानो लोग अचानक गहरी नींद से जागे और पाया कि वे बेहद खराब हालात में रह रहे हैं और उन्होंने मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला कर लिया। लेकिन ये लोग कौन हैं और अभी क्यों जागे हैं?
 
इसका संक्षिप्त जवाब यह है कि समग्र तौर पर वे देश के राजनीतिक परिदृश्य पर एक नई ताकत हैं। यह नई ताकत है- मध्यम वर्ग। वे इसलिए सो रहे थे क्योंकि जानते थे कि कुछ भी करना व्यर्थ होगा। यहां तक कि वर्ष 2001 तक इस वर्ग की देश की कुल आबादी में महज छह फीसदी हिस्सेदारी थी। ऐसे में इस वर्ग के लोग जानते थे कि वे चुनावी नतीजों पर असर नहीं डाल सकते।
 
लेकिन यह सब अब इतिहास है। मध्यम वर्ग ने अभूतपूर्व गति से अपनी तादाद बढ़ने के साथ यह भांप लिया कि उसकी राजनीतिक अप्रासंगिकता का दौर अब लद गया है। नेशनल कौंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के मुताबिक 2001-2002 में 5.7 फीसदी मध्यम वर्ग था, जो आज देश की कुल आबादी का लगभग 15 फीसदी है। उम्मीद है कि देश की कुल आबादी में इसकी हिस्सेदारी 2015-16 तक बढ़कर 20.3 फीसदी और 2025-26 तक 37.2 फीसदी हो जाएगी। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि मध्यम वर्ग इस तरह का बर्ताव करने लगा है, मानो उसे पर लग गए हों और वह देश के भविष्य को अपने हाथों में लेकर इसे संवारना चाहता है।  
 
मगर मध्यम वर्ग वास्तव में चाहता क्या है? इसका जवाब पाने के लिए आपको सिर्फ यह देखना है कि वे किस तरह के मसलों पर सड़कों पर उतर रहे हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण, वे सुदृढ़ कानून-
व्यवस्था तथा अपराध-मुक्त सड़कें चाहते हैं। वे कानून का राज और नेताओं, नौकरशाहों और पुलिसकर्मियों से जवाबदेही की उम्मीद करते हैं। वे चाहते हैं कि भ्रष्टों को दंडित किया जाए। वे बेहतर काम करने वाली लोकसेवाएं चाहते हैं। वे उच्च गुणवत्ता की शिक्षा चाहते हैं। यह सूची और भी लंबी है।
 
जरा सोचें कि इस सूची और उन चीजों के बीच कितनी विसंगति है, जिनको लेकर अमूमन राजनेता अपना अभियान चलाते हैं। इन चीजों में मुफ्त शराब और मुफ्त खैरात (साइकिल, टीवी सेट्स इत्यादि) तथा विभिन्न जातियों व समुदायों के लिए आरक्षण शामिल है। राजनीतिक दल अभी भी जीतने के लिए गरीबों को मुफ्त उपहार बांटने पर ध्यान दे रहे हैं, जबकि एक नया मतदाता वर्ग ठीक उनकी नाक के नीचे आकार ले रहा है जो खैरात के बजाय सुशासन को लेकर ज्यादा फिक्रमंद है। आम आदमी पार्टी इस लहर पर सवार हो सकती थी, लेकिन इसकी समाजवादी लफ्फाजी और इसका आत्मनिर्भर ग्रामीण गणतंत्र के प्रति लगाव इसे उस नए शहरी मध्यम वर्ग से दूर कर रहा है, जो पीछे नहीं आगे की ओर देखता है। 
 
भारतीय राजनीति व्यापक बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। नए मध्यम वर्ग को अपनी क्षमताओं का अहसास हो गया है। हालांकि यह अब तक खुद अपनी मुखर आवाज नहीं खोज पाया है, लेकिन तलाश जारी है और यह उसे पा भी लेगा। यह अच्छी खबर है। दुनियाभर के अनुभव यही बताते हैं कि जब मध्यम वर्ग खेल में उतरता है तो लोकतंत्र में मजबूती आती है और शासन भी सुधरता है।
 
टोनी जोसेफ
 
बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन    

 

 

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