श्रीराम ने बताया जन्मभूमि का महत्व
वाल्मीकि रामायण में एक बड़ा ही प्रेरक प्रसंग आता है। जब श्रीराम ने रावण का वध करके लंका विजय कर ली, तब उन्हें सर्वप्रथम विभीषण का राजतिलक कर उसे लंका के सिंहासन पर आसीन करना था। इस कार्य के लिए उन्होंने लक्ष्मण को चुना।
लक्ष्मण से श्रीराम ने कहा - 'लक्ष्मण! तुम लंका जाकर विभीषण का विधिपूर्वक राजतिलक करो और फिर लौट आना।' श्रीराम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण लंका गए। उन्होंने जैसे ही राजधानी में प्रवेश किया, वे मंत्रमुग्ध रह गए।
वहां के हरे-भरे वृक्ष, सुंदर पुष्पों व लताओं से आच्छादित बगीचे, कल-कल बहते जल प्रपात, पक्षियों का मनमोहक कलरव और ऊंचे-सुंदर भवनों को देखकर लक्ष्मण का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने विभीषण का राज्याभिषेक किया और फिर लौटकर राम से बोले - 'भैया! लंका ने मेरा मन चुरा लिया है।
यह नगरी स्वर्ग जैसी है। आपकी आज्ञा हो, तो मैं यहीं रह जाऊं।' श्रीराम ने उनकी बात सुनकर कहा - 'लक्ष्मण! इसमें कोई संदेह नहीं कि लंका का सौंदर्य निराला है। यह सचमुच स्वर्ग जैसी नगरी है। यहां चारों ओर अपार प्राकृतिक सौंदर्य हैं, समृद्धि है।
किंतु याद रखो, सौंदर्य, समृद्धि व वैभव से परिपूर्ण होने के बावजूद लंका, अयोध्या की बराबरी नहीं कर सकती, क्योंकि वह हमारी जन्मभूमि है। जहां व्यक्ति जन्म लेता है, वहां की मिट्टी जैसा आनंद कोई अन्य भूमि नहीं दे सकती, इसलिए हमारी अयोध्या तीनों लोकों से बढ़कर है।'
यह सुनते ही लक्ष्मण की आंखों से लंका का मायाजाल हट गया। वस्तुत: जन्म देकर पालन-पोषण करने वाली जन्मभूमि की अनुभूति दिव्य होती है। अत: उसके प्रति मन में सदा श्रद्धा-भाव रहना चाहिए।






