रिश्तों के रेशमी ताने-बाने की बुनियाद
भगवान उपाध्याय | Aug 11, 2012, 00:03AM IST

पारिवारिक झगड़े बढ़ने के कारण ही परिवार परामर्श केंद्र और कुटुंब न्यायालय जैसी संस्थाओं की जरूरत आन पड़ी। तलाक के मामले बढ़ गए। बुजुर्ग माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने वालों पर कानूनी शिकंजा लगाया गया। अखबारों में ऐसे कानूनी नोटिसों की संख्या भी बढ़ने लगी है, जिसमें पिता बता रहे हैं कि उन्होंने अपने बेटे से संबंध-विच्छेद कर लिए हैं।
अनुमान लगाइए कि कोई पिता अपनी संतान से संबंध-विच्छेद करने का फैसला अपने दिल पर कितना बड़ा पत्थर रखकर लेता होगा। जिस संतान को उसने जन्म दिया, पाल-पोसकर बढ़ा किया, उसके नाज-नखरे उठाए, उससे सारे संबंध तोड़ने की सूचना लिखने से पहले उनके बूढ़े हाथ दसियों बार कांपे होंगे। कई बार यह संदेश लिखा कागज उन्होंने फाड़ दिया होगा। सैकड़ों बार बेटे की करतूतों को देखकर उनकी आंखें डबडबा आई होंगी। आंसुओं का यह सैलाब जब बांध की सीमाओं को भी लांघ गया होगा, तब उन्होंने संबंध-विच्छेद करने का फैसला लिया होगा।
दरअसल रिश्तों की मजबूत बुनियाद ही हमारी भारतीय संस्कृति की असल पहचान रही है। विदेशी यह देखकर चकित होते हैं कि यहां रिश्तों का ताना-बाना इतना मजबूत कैसे है। विदेशों में खून के रिश्ते भी फीके पड़ जाते हैं, लेकिन हमारे यहां ममेरे-चचेरे-फुफेरे रिश्ते भी बखूबी माने जाते हैं। काशी और गयाजी जैसे तीर्थ स्थानों पर तो पंडे आपको आपकी बीस पुश्तों का हिसाब बता देंगे। विदेशों में रिश्तों के बारे में एक चुटकुला काफी प्रसिद्ध है। एक बार एक भारतीय ने एक विदेशी बच्चे से पूछा कि क्या इस फोटो में तुम्हारी मम्मी के साथ तुम्हारे पापा खड़े हैं? तो उस बच्चे ने जवाब दिया- नहीं, ये मेरे पापा नहीं बल्कि मेरी दूसरी मम्मी के तीसरे हसबैंड हैं। मेरे पापा तो अब अपनी दूसरी वाइफ के साथ रहते हैं।
रिश्तों की विविधता और प्रगाढ़ता ही वह वजह है, जिसके कारण हमारे भारतीय समाज में माता-पिता, दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, काका-काकी, बुआ-फूफाजी, नाना-नानी, मामा-मामी, मौसी-मौसा, भैया-भाभी, दीदी-जीजाजी, जीजा-साली, भाई-बहन, सास-बहू, देवरानी-जेठानी, ननद-भाभी जैसे तमाम संबोधन अभी भी जिंदा हैं। न केवल जिंदा हैं, बल्कि अटूट हैं। रिश्तों की गर्माहट है। इन्हीं रिश्तों में संबल है। रिश्तों का बंधन है। अपनों की याद है। अपने हैं तो ताकत है। संतुलन है, समन्वय है। बड़ों के पैर छूने की परंपरा है। कई रस्में हैं, रिवाज हैं। मायका-ससुराल पक्ष है। प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं, रिश्तों की नई कड़ी की तरह। ये परंपराएं, रस्में, संतुलन और गर्माहट बनी रहे। सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं, लेकिन परंपराएं कायम रहती हैं। परंपराओं से ही हमारा अस्तित्व कायम रहेगा। संस्कृति बची रहेगी। तभी हम हमेशा कह सकेंगे- सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा।






