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...तो शायद एक अपना और सपना बच जाए!

प्रिया आर्य | Sep 04, 2012, 00:44AM IST
 
 

कुछ अरसा पहले मार्केट में सहेली-दीदी (वह उम्र में मुझसे बड़ी हैं) की डॉक्टर भाभी मिल गईं। हालचाल पूछने के बाद सीधे मुद्दे की बात पर आ गईं, जैसे बरसों से मेरा इंतजार कर रही हों कि कब मैं मिलूं और वह मन का गुबार निकालें। उन्होंने बोलना शुरू किया- ‘समझाओ उसे। दोस्त है तुम्हारी। बताओ कि तुम्हारी शादी हो गई, बेटा हो गया। वह उम्र में तुमसे काफी बड़ी है और अभी तक कुंवारी बैठी है। अब मीन-मेख निकालने की उम्र नहीं रही। जिसे हम पसंद कर दें, उससे शादी कर ले। कब तक यूं भाई-भाभी के घर बैठी रहेगी! अच्छे लड़के की ख्वाहिश थी, तो पैसेवाले घर में पैदा होना था।’ यह वही भाभी हैं, जो कभी उसे ननद से ज्यादा सहेली समझती थीं, मगर लगा कि आज दूध का दूध और पानी का पानी हो गया।

मेरी सहेली-दीदी अपने पैरों पर खड़ी है, मगर शादीशुदा नहीं है। सबसे बड़ा दोष तो यही है उसका। 40 की दहलीज पर खड़ी अविवाहित बेटी को घर से ताने मिलने लगे थे। भाभियां उसे बोझ समझतीं, दोनों भाई बात-बात पर टोकते रहते। माता-पिता न चाहते हुए भी बेटे-बहू के सामने उसे उल्टा-सीधा कहते, ताकि बेटी को उनसे ज्यादा जली-कटी न सुनने मिले। भाभियों की कड़वी जुबान की तुलना में मां की झिड़की उसे कम तकलीफ पहुंचाती थी। मां बंद कमरे में बेटी को गले लगाकर उसके आंसू पोंछ लेती। भाभी से ही पता चला कि उसके माता-पिता भी नहीं रहे। यानी अब तो उसे भाई-भाभियों के तानों से बचाने वाला भी कोई नहीं रहा।

मध्यमवर्गीय होने के कारण उसके परिजन लड़केवालों की बड़ी-बड़ी मांगें पूरी करने में असमर्थ रहे। नतीजा, बेटी अपने ‘असली’ घर नहीं जा पाई। दो भाइयों की इकलौती चहेती बहन और माता-पिता की लाड़ली ने कभी सोचा न होगा कि एक दिन अपना ही परिवार पराया हो जाएगा। अभिभावक बड़े जतन से बेटियों को पढ़ाने-लिखाने, उनका जीवन संवारने में अपनी पूंजी लगाते हैं और फिर उनके विवाह में दहेज जैसी अनचाही मांगों को पूरा करने के लिए अपनी जमापूंजी भी लुटा देते हैं।

हालांकि अब जमाना बदल रहा है। लड़केवाले मुंह खोलकर दहेज की मांग नहीं करते, मगर ये तो कहते देखा ही गया है कि- ‘हमें कुछ नहीं चाहिए, आप अपनी बेटी को अपनी इच्छा से जो भी देना चाहें, दे दें। वह सब उसी के लिए होगा।’ कान सीधे न पकड़कर घुमाकर पकड़ने का तरीका, बहुत सुलझा और सोचा-समझा।

अविवाहित लड़की के अपमान, सहनशक्ति के परीक्षण और परीक्षाओं की प्रक्रिया विवाह योग्य उम्र पर पहुंचते ही शुरू हो जाती है। शुरुआत देखने-दिखाने से होती है। नाश्ते-पानी, सेवा में पानी की तरह बहता है पैसा और भावनाएं। इन सबके बाद भी ‘सोचकर बताते हैं’ जैसे वाक्य। लड़की मन में आस लगाए, तो लगाती रहे, अपनी बला से। हद तो तब हो जाती है, जब लड़का, लड़की को पसंद कर लेता है। माता-पिता की रजामंदी से दोनों एक-दूसरे से बात करने लगते हैं। लड़की, लड़के से गहरे जुड़ने लगती है, उसके साथ जीवन के सपने देखने लगती है। और अचानक लड़केवालों के यहां से खबर मिलती है कि यह शादी नहीं हो पाएगी। कारण वही घिसे-पिटे : दहेज में मांगी गई नकद राशि या उपहारों में लड़की के पिता द्वारा फेरबदल क्यों किया गया।

लड़की अंदर से टूट जाती है। भावी पति मानकर उसके साथ देखे खुशरंग सपने अब रह-रहकर तकलीफ पहुंचाने लगते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ उस सहेली-दीदी के साथ। काश! ऐसे में लड़का दृढ़ता से कदम बढ़ाए, अपने माता-पिता को समझाए कि वे बेटे को बेच नहीं रहे, उसके लिए जीवनभर साथ निभाने वाली संगिनी ला रहे हैं। तो इस तरह शायद एक सपना बच जाए, किसी का अपना बच जाए!
 
 
 

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