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कड़वे कटाक्ष से तो मीठी गालियां ही भलीं

भगवान उपाध्याय | Mar 31, 2012, 00:48AM IST
 
 

भास्कर ब्लॉग. .

अपने बेटे की ससुराल आए शर्माजी को शायद अंदाजा नहीं होगा कि यहां उनका स्वागत गालियों और पहेलियों के साथ होगा। शर्माजी बेहद संजीदा और संयम रखने वाले व्यक्ति थे, लिहाजा उन्होंने आपा नहीं खोया, बल्कि माहौल को समझते हुए इसका भरपूर आनंद उठाया। यदि वे तुनकमिजाजी होते तो शायद गुस्से में आकर यहां से लौट जाते। आखिरकार उन्हें बेटे की ससुराल में इतनी गालियां सुनने को मिलीं, जितनी उन्होंने अपनी जिंदगी में नहीं सुनी होंगी।


दरअसल, शर्माजी के बेटे की ससुराल राजस्थान से सटे मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के एक छोटे-से गांव में थी। यहां परंपरा है कि जब भी ब्याईजी (समधी) यहां आते हैं तो उनका स्वागत इसी अंदाज में होता है। एक आंगन में समधी बैठाए जाते हैं और दूसरे में दूसरे पक्ष की महिलाएं बैठती हैं।


महिलाएं मालवी गीतों के माध्यम से मीठी-मीठी गालियों की बौछार करती हैं। उनके शब्दों में छुपे भाव पर गौर फरमाएं तो पता चलता है कि समधी को महामूर्ख बनाने का प्रयास किया जाता है। गीतों में समधी को साड़ी पहनाने की धमकी दी जाती है। कुछ पहेलियां भी पूछी जाती हैं, जिनका जवाब समधी को देना होता है। यहां समधी की स्थिति विचित्र हो जाती है।


यदि वे जवाब नहीं देते हैं तो उन्हें गूंगा या बहरा बताया जाता है और यदि जवाब दे देते हैं तो जवाब में मीनमेख निकाले जाते हैं। इस दौरान माहौल कभी तल्ख तो कभी रोचक होता है। सवाल-जवाब के बीच देशज शब्दों में गालियां दी जाती हैं लेकिन इन गालियों में परंपरा की मिठास, अपनत्व और दो परिवारों के मिलन का रस छुपा होता है, इसलिए कोई बुरा नहीं मानता।


इसके उलट यदि वर्तमान माहौल में समधियों के रिश्तों और व्यवहार को देखा जाए तो जमीन-आसमान का फर्क नजर आता है। घर में समधी कब आए और कब चले गए, पता ही नहीं चलता। घर में समधी आने पर उत्सव के बजाय तनाव का माहौल बन जाता है। दोनों पक्ष एक-दूसरे से बात ही नहीं करते। बात होती भी है तो देश और दुनिया के घटनाक्रम पर चिंता की या फिर मौसम में आ रहे बदलाव की।


हंसी-ठिठौली और निजी बातों से इस दौर में परहेज देखा जा रहा है। जहां तक गालियों की बात है, तो आजकल ऐसी गालियां प्रचलन में हैं, जिन्हें यहां दोहराया नहीं जा सकता। रिश्तों में बन रही दूरियों के कारण ही परिवारों में कलह, तनाव और विघटन की नौबत आ रही है।

जुबान बेलगाम होने लगी है। आखिर क्या कारण है कि आज जरा-जरा सी बात पर परिवारों में मनमुटाव और मतभेद होने लगे हैं? पहले की गालियां मीठी क्यों लगती थीं? आजकल तो शब्दों के घाव इतने गहरे होते हैं कि जिंदगी भर नहीं भरते।

गालियों पर पिछले दिनों वरिष्ठ निर्देशक और गहन शोधार्थी डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी पढ़ने को मिली। ‘चाणक्य’ फेम डॉ. द्विवेदी कहते हैं कि गालियां भी कुछ प्रदेशों की संस्कृति का हिस्सा हैं। ये यहां की बोली में रची-बसी हैं। सच भी है। इंदौर में मालवी बोली में गालियां पड़ती हैं, लेकिन कोई बुरा नहीं मानता।


कानपुर चले जाइए, वहां कई शब्द ऐसे बोले जाते हैं, जो मध्यप्रदेश में गाली की श्रेणी में आते हैं। उर्दू जुबान में तो गालियों की तहजीब ही जुदा है। वहां पहले ही चेता दिया जाता है- जनाब, आपकी शान में गुस्ताखी हो जाएगी। ऐसी गालियां वास्तव में गालियां नहीं लगतीं, बल्कि गुदगुदाती हैं। हालांकि यह अपने-अपने मिजाज का भी मामला है। किसी की गाली भी मीठी लगती है तो किसी की प्यार भरी बोली भी गाली लगती है।


आजकल फिल्मों से लेकर टीवी सीरियल्स में भी गालियां सुनाई देने लगी हैं। क्रिकेट के मैदान में भी इस विधा का प्रवेश हो चुका है। संसद और विधानसभाओं में भी यह खूब चल रही हैं। लेकिन गालियां अब अपशब्दों का पर्याय बन गई हैं। मीठी-मीठी गालियां सुनने को मिलें तो गालियां भी भली लगती हैं।
 
 
 

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