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सामाजिक सद्भाव या तनाव?

 
Source: वेदप्रताप वैदिक   |   Last Updated 00:07(28/12/11)
 
 
 
 
चुनाव भी कैसी बला है? नेताओं से जो करा ले, वह कम। मतदाताओं की खुशामद करना तो आम बात है। उनके बीच पैसा, शराब, कपड़े वगैरह बांटने की बातें भी हम सुनते ही आए हैं, लेकिन इधर हमारी सरकार ने उत्तरप्रदेश का चुनाव जीतने के लिए कुछ ऐसे पापड़ बेल दिए हैं, जो देश का हाजमा हमेशा के लिए खराब कर सकते हैं। उत्तरप्रदेश में 125 सीटें ऐसी हैं, जिनमें मुसलमान मतदाता जिधर चाहें, पलड़ा झुका सकते हैं।

माना यह जाता है कि मुसलमान, दलित और पिछड़े थोकबंद वोट देते हैं। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे नागरिकों की तरह अपने विवेक का प्रयोग न करें, बल्कि झुंड बनाकर अपने वोट गिरा दें। मुसलमानों के थोक वोट पाने के लिए कांग्रेस ने नया दांव मारा है। उसकी सरकार ने घोषणा कर दी है कि अब अल्पसंख्यकों को साढ़े चार प्रतिशत का आरक्षण मिलेगा।

लेकिन सरकार ने अपनी घोषणा में मुसलमान शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। उसने ‘अल्पसंख्यक’ कहा है। वह मुसलमान कहती तो पकड़ी जाती। दूसरे अल्पसंख्यक भी नाराज हो जाते। अब ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी, सभी खुश हो सकते हैं। क्या देश के मुसलमान इतने नादान हैं कि वे सरकार की इस चाल को समझ नहीं पाएंगे? अनेक मुस्लिम संगठनों ने कहना शुरू कर दिया है कि यह साढ़े चार प्रतिशत क्या है? क्यों है? देश में मुसलमानों की आबादी तो 15 प्रतिशत है।

उत्तरप्रदेश में 18 प्रतिशत है। 4.5 प्रतिशत तो शुद्ध अन्याय है। और फिर इस 4.5 प्रतिशत में आपने ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का दुमछल्ला भी जोड़ दिया है, यानी 4.5 प्रतिशत में भी चार-पांच भागीदार बन जाएंगे। इन सब भागीदारों का बंटवारे का अनुपात क्या होगा? क्या मुसलमानों के हाथ सिर्फ एक या दो प्रतिशत का लाभ ही पड़ेगा? यह तो मुसलमानों के साथ धोखा होगा। अभी कई प्रदेशों में उन्हें 14 से 3 प्रतिशत का आरक्षण मिला हुआ है। वह घटकर न्यूनतम से भी न्यून हो जाएगा। क्या इन रेवड़ियों से मुसलमानों का पेट भर जाएगा?

इसके अलावा यह आरक्षण सभी मुसलमानों के लिए नहीं है। सिर्फ उन मुसलमानों के लिए है, जो पिछड़ी जातियों के हैं। यानी अब मुसलमानों को भी जातियों में बांटकर देखा जाएगा। उनमें फूट डाली जाएगी। जो मुसलमान बेहद गरीब हैं, लेकिन जिनकी गिनती इन जातियों में नहीं होगी, वे इस आरक्षण से वंचित रह जाएंगे।

इस अर्थ में ज्यादातर मुसलमान इस आरक्षण से खफा हो जाएंगे। कांग्रेस क्या कर रही है? वह चौबेजी से छब्बेजी बनने की कोशिश कर रही है, लेकिन आसार ऐसे हैं कि वह दुबेजी बनकर रह जाएगी। मुसलमान उलेमा ज्यादा नाराज होंगे, क्योंकि जातिवाद का मतलब ऊंच-नीच का भेदभाव! इस्लाम तो इसके बिल्कुल विरुद्ध है। यह इस्लाम के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है। कई मुसलमान संगठन मांग कर रहे हैं कि यदि मुसलमानों को आरक्षण देना है तो सबको दो और एक-जैसा दो।

कई मुस्लिम नेताओं ने इस आरक्षण को एक अच्छी शुरुआत कहा है तो उनसे पूछा जा सकता है कि इस शुभारंभ का समापन वे कैसा चाहते हैं? क्या वे मुसलमानों के लिए आगे जाकर अलग वोट, अलग उम्मीदवार या अलग चुनाव-क्षेत्र मांगेंगे? और क्या फिर वे एक नए पाकिस्तान की मांग रखेंगे? जरा याद करें कि 1906 में पैदा हुई मुस्लिम लीग ने इसी तरह का शुभारंभ किया था या नहीं? उसकी पूर्णाहुति कहां जाकर हुई? उससे मुसलमानों का क्या फायदा हुआ? वे तीन टुकड़ों में बंट गए। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश! 64 साल बाद भी उनकी दुर्दशा वैसी ही है, जैसी कि अब से 200 साल पहले थी। यह आरक्षण उन्हें क्या दुबारा किसी अंधी गली में नहीं धकेल देगा?

इस आरक्षण का समर्थन करने वाले मुस्लिम नेता यह क्यों भूल जाते हैं कि इससे देश के मुसलमानों का कन भर लाभ भी नहीं होगा, लेकिन मन भर नुकसान हो जाएगा। अभी से कुछ तत्व इस प्रचार में जुट गए हैं कि यह मुस्लिम तुष्टीकरण है। इसके फलस्वरूप सारे गैरमुस्लिम लोगों को मुसलमानों से ईष्र्या होने लगेगी। जो मुसलमान अपनी योग्यता से आगे बढ़ेंगे, उनके बारे में भी मान लिया जाएगा कि वे चोर दरवाजे से घुस आए हैं।

सबसे ज्यादा नाराजी उन पिछड़ों को होगी, जिनके 27 प्रतिशत में 4.5 प्रतिशत की सेंध लग जाएगी। हालांकि पिछड़े नेताओं ने संसद में इस प्रावधान का विरोध नहीं किया है, क्योंकि वे भी मुसलमानों के थोक वोट पर लार टपकाए हुए हैं, लेकिन उन्हें पता है कि गांवों और कस्बों के पिछड़े लोग, जिनका मुसलमानों के साथ रोजमर्रा का घनिष्ठ संबंध रहता है, वे इस आरक्षण पर सख्त नाराज होंगे।

वे मान रहे हैं कि यह गरीबी में आटा गीला करना है। यह सामाजिक सद्भाव नहीं, इससे सामाजिक तनाव पैदा होगा। इसका सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है। वह उप्र में पिछड़ों के वोट के बिना चुनाव कैसे जीत सकती है? यदि पिछड़े नेता थोड़े आक्रामक हो जाएं तो वे कांग्रेस की फजीहत कर सकते हैं। मियां की जूती मियां के सिर पड़ सकती है।

अब तक हमारे नेता वोटों के लिए जाति को भुनाते रहे। वे जात का जहर लोगों को पिलाते रहे, लेकिन अब वे मजहब को भी अपनी सेवा में पेल रहे हैं। आश्चर्य है कि भाजपा के अलावा कोई भी दल या नेता इस आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा है। सबसे ज्यादा दुखद बात तो यह है कि वर्ग-संघर्ष में विश्वास करने वाले हमारे मार्क्‍सवादी और कम्युनिस्ट भाई भी इस जाति और मजहबी आरक्षण पर अपना मुंह नहीं खोल रहे हैं।

यह आरक्षण हमारी स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों का हनन है। यह हमारे संविधान का मजाक है। यदि सचमुच हम मुसलमानों, दलितों, पिछड़ों की मदद करना चाहते हैं तो उन्हें जात और मजहब की बेड़ियों में क्यों बांधें? उनमें जो भी जरूरतमंद हो, सचमुच गरीब हो, उसे आरक्षण दें और सिर्फ शिक्षा में आरक्षण दें, ताकि वे अपने पांव पर खड़े हो सकें, खुद पर गर्व कर सकें और अपने को दया का पात्र न बना डालें। आजादी के 64 साल बाद हम जातीय आरक्षण पर पुनर्विचार करते, लेकिन इसकी बजाय हम उल्टे आरक्षण के गहरे और नए दलदल में फंसते चले जा रहे हैं। -लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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