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ठोस यथार्थ के धरातल पर

भास्कर न्यूज | Dec 29, 2012, 00:42AM IST
निराधार ऊंची महत्वाकांक्षाओं की बजाय व्यावहारिक उम्मीद हमेशा बेहतर रणनीति होती है। इसलिए ठीक ही है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए अनुमानित विकास दर को घटा दिया गया है। राष्ट्रीय विकास परिषद ने जिस योजना दस्तावेज को मंजूरी दी, उसमें अब 2012-17 के बीच औसत वार्षिक विकास दर 8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि पहले इसे 8.2 प्रतिशत रखा गया था। इस कटौती से आर्थिक जगत में मायूसी गहराएगी, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में अति-उत्साह का कोई आधार भी नहीं है। हकीकत तो यह है, जैसा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा कि 8 प्रतिशत की विकास दर भी तभी हासिल होगी, अगर योजना अवधि के अंतिम तीन वर्षो में हालात इतने सुधर जाएं कि अर्थव्यवस्था 9 फीसदी की सालाना दर पा ले। इन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री का राजकोषीय अनुशासन और समावेशी विकास के लिए कुशल लक्ष्य निर्धारण पर जोर देने का औचित्य स्वयंसिद्ध है।
 
मनमोहन सिंह ने कहा कि विश्व अर्थव्यवस्था हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन घरेलू बाधाओं से जरूर निपटा जा सकता है। प्रधानमंत्री ने खास तौर पर ऊर्जा के क्षेत्र में सब्सिडी लगातार घटाने पर जोर दिया और आगाह किया कि ऐसा न होने पर योजना खर्च में कटौती करनी पड़ेगी, जिसका असर विकास पर पड़ेगा। सरकार ने 12वीं योजना के दौरान गरीबी 10 फीसदी घटाने और गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के पांच करोड़ अवसर निर्मित करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए कल्याणकारी कार्यो पर खर्च बढ़ाना होगा। जिस समय मध्यम विकास दर के कारण राजस्व अधिक बढ़ने की आशा न हो, तब ऐसी योजनाओं के लिए धन तभी उपलब्ध हो सकता है, जब उन क्षेत्रों में सब्सिडी घटे, जहां लोग बाजार द्वारा तय कीमत चुकाने की स्थिति में हैं। सरकार ने ऊर्जा को ऐसे ही क्षेत्र के रूप में चित्रित किया है।
 
बहरहाल, अधिक टिकाऊ समाधान विकास दर में वृद्धि ही है। अगर सरकार बुनियादी ढांचा क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद के 9 फीसदी के बराबर वार्षिक निवेश तथा कारखाना क्षेत्र में दस फीसदी तथा कृषि क्षेत्र में चार फीसदी विकास दर प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल कर पाई तो सामाजिक क्षेत्र के लक्ष्यों की दिशा में भी प्रगति होगी। वरना अभी आशा पर निराशा हावी है।
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