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गुरु के वचन सुन निर्भीक हुआ राजा

Bhaskar News | Feb 08, 2013, 01:25AM IST
 
 

एक  राजा था। उसके जीवन में किसी वस्तु की कमी नहीं थी। पड़ोसी राज्यों से भी उसके मैत्रीपूर्ण संबंध थे। इसके बावजूद राजा के मन में सदैव यह भय बना रहता था कि कहीं कोई हमला करके उसे मार न डाले।
 
एक दिन राजा अपने शयनकक्ष में लेटा हुआ इसी बात पर सोच रहा था कि अचानक उसे एक उपाय सूझा। उसने सोचा कि एक ऐसा महल बनवाया जाए, जो चारों ओर से बंद हो। न उसमें खिड़कियां हों, न रोशनदान, न दरवाजे हों। बस, मात्र एक दरवाजा हो, जिससे प्रवेश और निकास हो सके। ऐसे महल पर किसी का हमला होगा भी, तो वह कारगर न होगा।
 
अगले ही दिन से राजा ने इस महल को बनवाना आरंभ कर दिया। कारीगरों ने दो माह में ही महल तैयार कर दिया। एक परिंदा भी उसमें नहीं घुस सकता था। अब राजा के मन का भय भी जाता रहा। उसे विश्वास हो गया कि अब उस पर कोई हमला नहीं कर सकता। एक दिन राजा के गुरु मिलने आए। राजा ने बड़े उत्साह से उन्हें महल दिखाकर इसके बारे में उनकी राय पूछी, तो वे बोले- ‘राजन महल अच्छा बनवाया है, किंतु एक भूल कर दी।’ राजा ने वह भूल जाननी चाही, तो गुरु बोले- ‘आपने इस महल में एक दरवाजा रखा है।
 
उससे दुश्मन तो नहीं आ सकता, किंतु मृत्यु आ गई तो क्या करेंगे?’ गुरु के वचन सुन राजा के ज्ञानचक्षु खुल गए। उसने समझ लिया कि बंद महल से वह दुश्मन से तो बच सकता है, किंतु मृत्यु तो फिर भी आ सकती है। अब राजा ने स्वयं को हर प्रकार के भय से मुक्त कर निर्भीक रहना सीख लिया। जो जन्मा है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। अत: मृत्यु से डरने के स्थान पर जब तक जीवन है, उसे कर्मशील रहते हुए पूर्ण साहस व आनंद के साथ जीना चाहिए।
 

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