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साधु कनकदास ने बताई सही राह

Bhaskar News | Dec 31, 2012, 00:42AM IST
 
 

दक्षिण भारत में एक संत हुए हैं जिनका नाम था मध्वाचार्य। मध्वाचार्य के अनेक शिष्य थे। उन शिष्यों में एक का नाम था - कनकदास। साधु कनकदास आला दर्जे के संत थे। ज्ञान और विनम्रता की वे प्रतिमूर्ति थे।
 
एक दिन मध्वाचार्य के कुछ शिष्य इस विषय पर परस्पर चर्चा कर रहे थे कि ईश्वर को कौन प्राप्त कर सकता है। सभी के अलग-अलग मत थे और किसी भी एक मत पर सहमति नहीं हो पा रही थी। अंततोगत्वा सभी ने साधु कनकदास से पूछने का निश्चय किया।
 
शिष्यों में से एक साधु ने सर्वप्रथम कनकदास से प्रश्न किया - ‘क्या मैं परमात्मा को पा सकता हूं?’ कनकदास ने उत्तर दिया- ‘अवश्य, किंतु यह तब होगा जब ‘मैं’ जाएगा।’ इसके बाद सभी शिष्यों ने बारी-बारी से यही सवाल किया और सभी को कनकदास ने यही उत्तर दिया। हैरान शिष्यों में से एक ने उनसे पूछा- ‘स्वामीजी आप भी तो भगवान के पास जाएंगे न?’ कनकदास बोले- ‘अवश्य जाऊंगा, किंतु तभी, जब ‘मैं’ जाएगा।’
 
शिष्य ने अगला प्रश्न किया - ‘स्वामीजी! यह ‘मैं’ कौन है और यह किस-किस के साथ जाएगा?’ तब कनकदास ने स्पष्ट किया- ‘मैं’ का अर्थ है मोह, अहंकार। जब तक ‘मैं’ और ‘मेरा’ तथा ‘मैं हूं’ का अहंकार नहीं मिटेगा, तब तक हम ईश्वर को नहीं पा सकते। वस्तुत: प्रभु प्राप्ति के मार्ग की यही सबसे बड़ी रुकावट है।’ सभी शिष्यों के मन की उलझन कनकदास के उत्तर से दूर हो गई। सार यह है कि अहंकार द्वैतभाव को लाता है, जो अद्वैत की राह की सर्वप्रमुख बाधा है। अहंकार का विसर्जन ही ईश्वर से एकाकार होने की दिव्य उपलब्धि कराता है।
 

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