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शांतिपूर्ण जीवन जीना है तो तन, मन और आत्मा को न भूलें

पं. विजयशंकर मेहता | Jul 30, 2012, 00:12AM IST
 
 

परमात्मा ने हमारे जीवन प्रबंधन को बहुत ही व्यवस्थित तरीके से जमाकर हमें दिया है, लेकिन हम उसे समझ नहीं पाते और बिना समझे उसका उपयोग करने लगते हैं, जो बाद में दुरुपयोग में बदल जाता है। इन छोटी-छोटी बातों को गहराई से समझ लें तो बहुत काम आएंगी।

जिसे भी शांतिपूर्ण जीवन जीना है तो उसे शरीर, मन और आत्मा तीनों को कभी नहीं भूलना चाहिए। इंद्रियों को आत्मा का औजार कहा गया है। परमात्मा ने यह औजार हमें देकर आत्मा की आवश्यकताएं पूरी करने के अवसर दिए। इंद्रियों का संबंध उपभोग से जोड़ा गया है और सामान्य रूप से भोगों की आलोचना की जाती है। साधारण लोग इसका अर्थ ये ले लेते हैं कि इंद्रियों के कारण पतन होता है, इसलिए इनका दमन किया जाए। शास्त्रों में शब्द आया है इंद्रिय-निग्रह।

इसका अर्थ दमन करना नहीं है, इनकी दिशाओं को मोड़कर इनका सदुपयोग करना है। नियंत्रित इंद्रियां सबसे अच्छी दोस्त होंगी और अनियंत्रित इंद्रियों से बड़ा कोई दुश्मन नहीं होता। जो लोग अपनी इंद्रियों से परिचित रहेंगे, वे स्वयं का और दूसरों का भी पूरा व्यक्तित्व ही देखेंगे। अभी इंद्रियों के दुरुपयोग के कारण हम न तो स्वयं को जान पाते हैं और न ही दूसरों को, इसी कारण अशांत रहते हैं। इंद्रियां हमें मनुष्य से मनुष्य में भेद करा देती हैं। अपना-पराया, भोग-विलास के झंझट यही से शुरू होते हैं। अध्यात्म कहता है, इंद्रियों के प्रति जागरूकता आते ही हम उस समग्र के प्रति विसर्जित होने लगते हैं, जिसे परमात्मा कहा गया है। इसलिए थोड़ा समय बाहर की दुनिया से हटकर भीतर की दुनिया में उतरकर इंद्रियों के प्रति होश जगाने में लगाएं।
 
 
 

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