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..और मलेशिया में भी वसंत पहुंच ही गया!

एम. जे. अकबर | May 06, 2012, 00:33AM IST
 
 

हर किसी को गुस्सा आ सकता है। लेकिन गुस्से से उठ खड़े होने में जवानी मददगार होती है। दो अच्छे कारणों से, किसी भी विद्रोह के केंद्र में युवा ही होते हैं। एक तो उनके पास समझौते का वक्त नहीं होता। उनकी निर्बाधता पर काम, परिवार और जायदाद जैसी बाध्यताओं की रोक नहीं होती, जिन्हें सामाजिक सुरक्षा की रीति कहा जाता है, जो हमें रूढ़ियों और प्रचलनों में बांधे रखती है। दूसरा कारण ज्यादा दिलचस्प है। जन आंदोलन को उकसाने वाले जटिल मिश्रण में सबसे महत्वपूर्ण उत्प्रेरक होती है, आशा, न कि क्रोध। उम्मीद, क्रोध का सकारात्मक चेहरा है।


21वीं सदी के पहले दो दशक दुनिया के उन हिस्सों में रोष के ज्वालामुखीय विस्फोट के लिए जाने जाएंगे, जिन्हें वाद (आस्था, आर्थिक दर्शन, देशभक्ति) के नाम पर गतिहीनता और निष्क्रियता में अटकाए रखा गया था। ये वाद आमतौर पर स्थानीय अभिजात्यों द्वारा सत्तावादी शोषण किए जाने के लिए भावनात्मक बहानों से ज्यादा कुछ नहीं होते।



हवा में एक सनसनी है, जो बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की याद दिलाती है, जब औपनिवेशिक शक्ति के विरुद्ध विक्षोभ था। इस वक्त उत्तर औपनिवेशिक विश्व उन लोगों को चुनौती दे रहा है, जिन्होंने सत्ता-प्राधिकार पर कब्जा जमाने के साथ ही अपनी जनता को हलचल की खुशबू, यानी आजादी देने से भी इनकार कर रखा है। आजादी का अर्थ विदेशी शासन से मुक्ति भर नहीं है। इसके साथ ही यह स्थानीय तानाशाही से स्वतंत्रता भी है।


गुस्से की प्रकृति ही ऐसी है कि वह हिंसा को भड़काता है। उल्लेखनीय बात यह है कि अफ्रीका से लेकर एशिया तक, आज के युवा उस चीज को समझ चुके हैं, जिसका पूर्वानुमान गांधी ने एक सदी से ज्यादा पहले लगा लिया था, जब यह विचार विश्वसनीय माने जाने के लिहाज से काफी नया और अनोखा था : वह यह कि हिंसा की तुलना में अहिंसा सत्ता-प्रतिष्ठान के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक होती है।



हिंसा एक झल्लाहट है, जुनून की एक लहर है, जो अपनी तत्क्षणिक दमक के दौरान किसी व्यक्ति की इच्छापूर्ति के अलावा ज्यादा कुछ नहीं करती और इसके परे, बहुत कुछ से वंचित कर देती है। हिंसा अनुत्पादक होती है। यह देखने वालों में भयारोपण करती है और लोकप्रिय मेलमिलाप की संभावना पर रोक लगाती है। हिंसा, सरकार द्वारा लगाए गए फंदे को मजबूत करती है, जो पीड़ित को अपराधी में बदल देता है।


अहिंसा सरकार को चुनौती देती है, पर राज्य को नहीं। यही कारण है कि राष्ट्रीय सेना सरीखे राज्य के प्रति निष्ठावान संस्थान इसका मुकाबला करने के अनिच्छुक होते हैं। गांधी एक फौलादी भविष्यद्रष्टा थे : उन्होंने अहिंसा की शक्ति को राष्ट्रीय सेना की बजाय, औपनिवेशिक सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों के खिलाफ आजमाया, जो भारतीयों को सबसे अच्छी स्थिति में भी निम्न मानते थे और सबसे बुरी स्थिति में घृणित।



इतिहास न सिर्फ कहीं अधिक बेहतर विचार का गवाह बना, बल्कि उसने यह विस्मयकारी तथ्य भी देखा कि जैसे ही एक बार भारतीयों और अंग्रेजों के बीच बदलाव के कायदों पर चर्चा हुई, वे दोस्त बन गए। अहिंसा ने जीत और दमन के घावों को चंगा कर दिया, फिर भले ही इसने साम्राज्य को ढहाया हो।


28 अप्रैल, शनिवार को किसी समय में कुआलालंपुर के अपरिवर्तनीय रहे कोनों से उभरकर युवा आगे राहों पर बढ़ चले और इस तरह वसंत मलेशिया पहुंचा। मौसम अचानक नहीं बदलते। अक्सर वे लड़खड़ाते हुए चलते हैं और कभी-कभी छल भी कर जाते हैं।



जैसे झूठी भोर हो सकती है, वैसे ही नकली वसंत भी आ सकता है। लेकिन एक दिन ऐसा भी आता है, जब छुपी हुई जड़ों से ताजा घास फूट पड़ती है, और जब मानवीय प्रकृति समेत तमाम प्रकृति भावहीन बुद्धि की बंधक नहीं रह जाती। यहां तक कि वसंत अपने मालियों को भी चौंका सकता है।


अनवर इब्राहीम के लंबे जाड़े में शामिल हैं जेल की निर्जन कालकोठरी में खोए कई बरस, मास-मीडिया द्वारा चलाया गया उनकी मानहानि का अभियान, जिसने न्यूनतम नैतिक मानकों को भी ताक पर रख दिया था और नितांत निराशा की दशा वाला भयंकर देशनिकाला। मलेशिया के युवा उपप्रधानमंत्री के तौर पर, एक जमाने में वे मुखिया महाथिर के उत्तराधिकारी नामांकित किए गए थे।


वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर रैंक तोड़ने के लिए दंडित किए गए। अंतरात्मा को आमतौर पर दुनियादारी से रिक्त कहकर खारिज कर दिया जाता है या फिर ऐसा अभिमान बताकर, जो शासन के सामूहिक बल को छिन्न-भिन्न कर देता है।


अनवर इब्राहीम और उनकी असाधारण साहसी पत्नी अजीजाह ने मतभेद के लिए बहुत भयंकर कीमत चुकाई। राज्य की विस्तारित शक्ति की आग उन पर बरसाई गई- ऐसी आग, जो कम प्रतिबद्ध लोगों को भस्म कर चुकी होती। यदि उनके पास कोई आशा थी, तो वह थी जनता में आस्था और व्यापक लोकतंत्र के वादे पर विश्वास।


भय को उभरते हुए देखना बड़ा दिलचस्प होता है। एक मिनट में यह धुंध की तरह छाया होता है और एक घंटे बाद धुंधली यादों में छितरा चुका होता है। बदलाव के बुनियादी पल का गवाह बनना और इस कायापलट के प्रमुख रचनाकार के साथ ऐसा करना एक सौभाग्य था।


अनुमान में यह आसान होता है कि बदलाव को टाला तो जा सकता है, पर रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसमें विश्वास करने के लिए गहरे, पक्के निश्चय की दरकार होती है। और जैसा कि सुबह से नागरिकों का इकट्ठा होना शुरू हो गया, बढ़ते समूह मिलकर एक होते गए, पुरानी राजनीति का संदर्भ मापदंड मानी जाने वाली जातीय पहचान घुलती नजर आने लगी, गलियों से लेकर छतें तक उत्साहवर्धन करते मलय मुस्लिमों, चीनी ईसाइयों, भारतीय हिंदुओं व मुसलमानों से अट गईं। फिर भले ही चाबुक फटकारने वाली सरकार ने अव्यवस्था फैलाने के लिए आंसूगैस के गोले छोड़े और हेलीकॉप्टरों ने झपट्टा मारा, लेकिन आप जान गए कि इतिहास के एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई।



युवा जान गए कि मुक्ति अहिंसा में ही निहित है। उन्होंने अपने गुस्से पर काबू पा लिया। और अनवर इब्राहीम अनवर बन गए- महज ऊपर खड़े नेता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मलेशिया के उभरते हुए संयुक्त परिवार में एक भाई। -लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।
 
 
 

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