संपादकीय.. पिछड़ेपन के कारण बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को ‘बीमारू’ राज्य कहने का चलन चला था। हालात आज भी बहुत नहीं बदले हैं। मानव विकास सूचकांकों से संबंधित रपटें अक्सर इन राज्यों के ‘बीमार’ होने की पुष्टि कर जाती हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नवजात मृत्यु दर के ताजा आंकड़े बताते हैं कि हालांकि इन तमाम राज्यों में यह दर घटाने में प्रगति हुई है, फिर भी इन राज्यों में जन्म के समय बच्चों की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। मध्य प्रदेश में यह दर सबसे ऊंची है, जहां जन्म के समय प्रति 1000 में 62 बच्चे मौत का शिकार हो जाते हैं।
उप्र और ओडिशा में यह संख्या 61 है। जबकि दूसरे छोर पर गोवा और केरल जैसे राज्य हैं, जो नवजात मृत्यु दर घटाकर 10 और 13 तक लाने में सफल रहे हैं। हिंदीभाषी प्रदेशों में आखिर यह पिछड़ापन क्यों है? इसका एक संकेत उप्र विधानसभा के चुनावी परिदृश्य से मिलता है। पिछले सात वर्षो में राज्य में दिमागी बुखार (इन्सेफेलाइटिस) से चार हजार मौतें हुईं और 19 हजार से ज्यादा लोग इससे पीड़ित हुए।
नतीजतन, इस बार राज्य में विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने चुनाव घोषणापत्रों में इसका जिक्र किया है और इससे मुक्ति दिलाने का वादा किया है। मगर चुनाव अभियानों में यह मुद्दा कहीं चर्चित नहीं है। आखिर ऐसे बुनियादी सवाल वोट दिलाने वाले मुद्दे क्यों नहीं माने जाते? क्या आम मतदाता यह नहीं मानता कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना सरकारों और प्रकारांतर में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी
है?
चूंकि लोग ऐसे प्रश्नों पर अपने प्रतिनिधियों से जवाब नहीं मांगते, इसलिए कुपोषण, बाल एवं नवजात मृत्यु दर, प्रसूता मृत्यु आदि जैसे सूचकांकों पर अपेक्षित सुधार के कार्यक्रमों का अस्तित्व सिर्फ घोषणाओं में बना रहता है और उन्हें लागू करने के क्रम में उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसा घोटाला सामने आ जाता है। हिंदी प्रदेशों की जनता को अब इन मुद्दों पर जागरूक होना पड़ेगा। जिन राज्यों ने इन मामलों में उल्लेखनीय प्रगति की है, उनसे सबक लेने की आवश्यकता है।