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स्कूल जाने वाले ये बच्चे

रस्किन बॉन्ड | Jul 17, 2012, 00:05AM IST
 
 

तकरीबन रोज ही मेरा सामना स्कूल जा रहे बच्चों से होता है। मसूरी के आसपास के गांव-देहातों के इन बच्चों में से बहुत-से ऐसे हैं, जो स्कूल बस का खर्च वहन नहीं कर सकते, लिहाजा वे पैदल ही शिक्षा पाने निकल पड़ते हैं। उनमें से कइयों को अपने स्कूल तक पहुंचने के लिए एक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

दस साल के रनबीर को स्कूल जाने के लिए चार मील चलना पड़ता है। लेकिन मैदानी इलाकों के चार मील और पहाड़ी इलाकों के चार मील में जमीन-आसमान का भेद होता है। रनबीर का स्कूल पहाड़ पर है और उसका कस्बा दो हजार फीट नीचे बसा है। रोज चार मील की चढ़ाई अच्छे-अच्छों का दम फुला सकती है। रनबीर के पास अच्छे जूते भी नहीं हैं, लेकिन फिर भी वह मुझे हमेशा चहकता हुआ नजर आता है। जब भी वह मुझे देखता है, हाथ हिलाकर मेरा अभिवादन करता है। कभी-कभी वह अपने पिता के खेत से मेरे लिए ककड़ियां ले आता है। मैं उससे ककड़ियों को बेमोल नहीं लेता और बदले में उसे कुछ पैसे दे देता हूं। इससे वह अपने लिए किताबें खरीद लाता है।

जाने कितने बच्चे रनबीर की तरह हैं। गरीब और अभावग्रस्त। लेकिन यह बात भी सच है कि वे अपने माता-पिता के स्कूल जाने के दिनों से बेहतर अवस्था में हैं। इनमें से अनेक बच्चों के माता-पिता कभी स्कूल नहीं जा सके और उन्होंने खेतों में काम करके ही पूरा जीवन बिता दिया। लेकिन रनबीर को देखकर लगता है कि वह बड़ा होकर जरूर कुछ बनेगा। रनबीर ने आज तक रेलगाड़ी नहीं देखी, लेकिन वह रोज ही पहाड़ों के ऊपर से उड़ते हवाई जहाजों को देखता है। एक बार उसने मुझसे पूछा कि हवाई जहाज कितनी दूर तक जा सकते हैं? मैंने जवाब दिया हवाई जहाज पूरी दुनिया का चक्कर लगा सकते हैं। तब उसने कहा तब तो मैं भी एक दिन पूरी दुनिया का चक्कर लगाऊंगा। काश, उसका सपना सच साबित हो।

कुछ साल पहले तक पहाड़ों में बहुत कम लड़कियां स्कूल जाती नजर आती थीं। वे घर में रहकर ही कामकाज करती थीं और बड़ी होने पर उन्हें ब्याह दिया जाता था। लेकिन अब स्कूल जाने वाले बच्चों में लड़कों जितनी ही तादाद में लड़कियां भी होती हैं। इन्हीं में से एक लड़की है बिंद्रा। वह महज चौदह बरस की है, लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज है। उसके पिता एक फॉरेस्ट गार्ड हैं और मुझसे भलीभांति परिचित हैं। मुझे बिंद्रा को भी रोज ही देखने की आदत पड़ गई है। एक बार जब वह एक हफ्ते तक नजर नहीं आई तो मैंने उसके भाई से पूछा कि बिंद्रा कहां है? कहीं उसकी तबीयत तो खराब नहीं हो गई? उसके भाई ने जवाब दिया, अरे नहीं, वह पूरी तरह तंदुरुस्त है, लेकिन वह घास की कटाई करने में मां की मदद कर रही है। मानसून का मौसम खत्म होने पर घास सूख जाती है, इसलिए हम उसे अभी काटकर रख लेते हैं। यह घास जाड़ों में काम आती है। मैंने उससे पूछा कि बिंद्रा घास काट रही है तो तुम उसकी मदद क्यों नहीं कर रहे? इस पर उसने जवाब दिया कि वह कैसे घास काटेगा, आज उसका क्रिकेट मैच जो है।

क्रिकेट कभी अमीरों का खेल हुआ करता था, लेकिन अब वह देश की जनता का प्रिय खेल बन चुका है। छुट्टी के दिन भारत के किसी हिस्से में चले जाइए, आपको मैदानों में झुंड बनाकर क्रिकेट खेलते बच्चे जरूर नजर आएंगे। उनमें से कई बच्चों को खेलते देखकर तो मैं दांतों तले अंगुली दबा लेता हूं। ये बच्चे बहुत प्रतिभाशाली और चुस्त-दुरुस्त हैं। पहाड़ों की कुछ स्थानीय देहाती टीमें तो किसी भी प्राइवेट स्कूल की टीम पर भारी पड़ सकती हैं, जबकि उन्हें न के बराबर सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि इन गरीब बच्चों को कभी बड़े स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका नहीं मिलता। वे कभी सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोगों की प्राथमिकता की सूची में शामिल नहीं हो पाते।

जैसे-जैसे जाड़ों का मौसम करीब आने लगता है और दिन छोटे होने लगते हैं, दूर-देहात में रहने वाले स्कूली बच्चे तेज कदमों से घर लौटते नजर आने लगते हैं। इसके बावजूद रनबीर और उसके दोस्त अंधेरा घिर आने के बाद ही अपने घर पहुंच पाते हैं। मेरे घर के सामने की ढलान से गुजरते हुए कभी-कभी वह मुझसे पूछता है कि अंकल, टाइम क्या हुआ है? तकरीबन हर स्कूली बच्चा मुझे अंकल के संबोधन से ही पुकारता है। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि उम्रदराज लोगों को अंकल बोलने की परंपरा कैसे शुरू हुई होगी? शायद इसकी शुरुआत उस लोककथा से हुई होगी, जिसमें यह बताया गया है कि यदि कोई बाघ आप पर हमला बोलने को तैयार हो तो उसे अंकल कहकर पुकारें। बाघ अपने नाते-रिश्तेदारों को नहीं खाते हैं। इस तरह अपनी जान बचाई जा सकती है। मुझे पता नहीं, यह जुगत कितनी कारगर हो सकती है। मुझे तो कभी इसे आजमाने का मौका नहीं मिला। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि यदि बाघ के स्थान पर कोई बाघिन हम पर हमला बोलने वाली हो और हम उसे आंटी कहकर पुकारें तो क्या वह और नाराज नहीं हो जाएगी?

जाड़ों के मौसम में पहाड़ों पर शाम छह बजे अंधेरा हो जाता है। रनबीर की कोशिश रहती है कि छह बजने से पहले देवदार का जंगल पार कर ले और खुली सड़क पर आ जाए। अंधेरे में चांद-तारों की रोशनी, दूर बसे गांव का उजास भी काफी होता है, लेकिन केवल तभी जब आप खुली सड़क पर हों। जंगलों में तो दिन के उजाले में भी रास्ता भटक जाने का अंदेशा होता है। रात में जंगल से गुजरना तो रनबीर जैसे बहादुर बच्चे के लिए भी खासा मुश्किल होगा। एक बार एक भालू रनबीर के पीछे लग गया था। जब उसने मुझे यह बताया तो मैंने उसे इस बात की बधाई दी कि उसने दौड़ में भालू को भी पछाड़ दिया। रनबीर ने कहा ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि मैं ढलान उतर रहा था। भालू चढ़ाई के दौरान ज्यादा फुर्ती दिखा पाते हैं। मैंने इस जानकारी के लिए रनबीर को शुक्रिया कहा। कौन जाने कब इसकी जरूरत आन पड़े।

स्कूल जाने वाले बच्चों की यह कहानी केवल पहाड़ों तक ही सीमित नहीं है। राजस्थान में रेत की आंधी से लेकर कश्मीर में बर्फ के अंधड़ तक स्कूली बच्चे जाने कितनी तकलीफें सहते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं। बड़े शहरों में तो फिर भी स्कूल बसें होती हैं, लेकिन ग्रामीण बच्चों के लिए स्कूल जाना आज भी आसान नहीं है। जैसे कि ओडिशा के एक जिले के बच्चों के बारे में हाल ही में पढ़ने को मिला कि पुल न होने के कारण उन्हें नदी तैरकर स्कूल जाना पड़ता है। इस तरह के हालात का सामना देश में जाने कितने बच्चों को करना पड़ता होगा। देशभर में अनेक बच्चे माता-पिता के काम में हाथ बंटाते हुए भी पढ़ाई करते हैं। उनके जज्बे को सलाम।

मैं अपनी खिड़की में खड़ा इन स्कूली बच्चों को देखता रहता हूं। छोटे-बड़े, कुछ भोले, कुछ शरारती, कुछ गंभीर, कुछ चंचल, वे सभी चले जा रहे हैं। वे सभी कहीं न कहीं जा रहे हैं। मैं आशा करता हूं कि वे एक बेहतर भविष्य की ओर जा रहे हों।

लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।
 
 
 

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