महत्वपूर्ण हस्तक्षेप
Bhaskar News | Aug 24, 2012, 03:53AM IST
मसलन, महाराष्ट्र में तकरीबन डेढ़ महीने पहले एक अदालत ने फैसला दिया कि अंकुश शिंदे नामक एक मुजरिम ने जिस समय अपराध किया, वह नाबालिग था और इस हाल में उसे फांसी की सजा नहीं दी जा सकती। इसी तरह 12 अन्य लोगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उन्हें मौत की सजा सुनाना सही नहीं था। पूर्व जजों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखकर इन सभी लोगों को जीवनदान देने का आग्रह किया है।
उन्होंने ध्यान दिलाया कि दो मुजरिमों को 1990 के दशक में फांसी पर लटकाए जाने के बाद यह जाहिर हुआ कि उन्हें मृत्युदंड सुनाना गलत था। यानी उनके साथ जो अन्याय हुआ, उसे सुधारने का अब कोई रास्ता नहीं बचा। जजों ने कहा कि फिलहाल वे इस बहस में नहीं पड़ रहे हैं कि फांसी की सजा का प्रावधान रहना चाहिए या नहीं- उन्होंने सिर्फ यह मुद्दा उठाया है कि यह सजा उचित एवं न्यायपूर्ण ढंग से दी जाए। बहरहाल, ताजा मामलों के सामने आने और न्यायजगत की मशहूर शख्सियतों द्वारा इसमें हस्तक्षेप करने से मृत्युदंड के औचित्य पर बहस में भी एक नया पहलू और जुड़ा है।
दरअसल, फांसी की सजा के खिलाफ जो दलीलें हैं, उनमें यह प्रमुख है कि यह दंड देने के बाद अगर संबंधित मामले में नए तथ्य सामने आए, तो फिर किसी सुधार की गुंजाइश नहीं रहती। इसके खिलाफ दूसरी बड़ी दलील है कि किसी सभ्य समाज में सजा बदले की भावना से प्रेरित नहीं हो सकती। चूंकि मृत्युदंड कहीं भी अपराध को रोकने में नाकाम रहा है, इसलिए इसकी उपयोगिता भी संदिग्ध है। ऐसे में जजों के दखल के बाद 13 लोगों की जिंदगी तो अवश्य ही बख्शी जानी चाहिए, साथ ही अब सजा-ए-मौत की जरूरत पर नए सिरे से बहस भी होनी चाहिए।







