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सत्संग जिस भी तरीके से मिले जीवन को उससे जरूर जोड़ें

 
Source: पं. विजयशंकर मेहता   |   Last Updated 00:10(26/01/12)
 
 
 
 
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जीने की राह.. निराशा आने पर हम आशा की किरण दूसरों में ढूंढ़ते हैं। वैसे तो सबसे अच्छा समाधान हमारे भीतर होता है, लेकिन फिर भी यदि बाहर ढूंढ़ रहे हों तो एक स्थान पर जरूर जाएं जिसे सत्संग कहते हैं। यहां कुछ ऐसा मिल जाता है, जो जीवन के नैराश्य को मिटा सकता है। निवृत्तमान शंकराचार्य सत्यमित्रानंदगिरिजी कहते हैं - सत्संग करते-करते विचार जागेगा, मन में करुणा जागेगी।


सत्संग आपको संसार में रहते हुए उलझने नहीं देगा। साधक को जब भी, जिस क्षण परमात्मा के प्रति भावोद्वेग होगा, जीवन धन्य हो जाएगा। यह क्षण तभी उपस्थित होता है, जब आपका मन संवेदनशील हो। संवेदना के रहते ही हृदय भाव विगलित हो जाता है। आज हम देख रहे हैं कि संवेदना समाप्त होती जा रही है।


निष्ठुरता और नैराश्य में जीने की आदत-सी पड़ गई है। यदि कुछ मंत्र गुनगुनाए जाएं तो उनके साथ एकाकार के क्षण उपस्थित होते ही हृदय गद्गद् हो जाता है। परंतु धीरे-धीरे अब यह सब लोप होता जा रहा है। किसी संत की वाणी, ग्रंथ, स्तोत्र से हृदय द्रवित होता है। संत का जीवन अत्यंत निर्मल होता है।

वे आत्मा के साथ एकाकार होकर अपनी वाणी प्रवाहित करते हैं। बाह्य जगत से उबरने की हम बहुत बार चेष्टा करते हैं। कभी छूटते हुए भी अनुभव करते हैं। परंतु अंतर्द्वद्वों से उबरने की चेष्टा करनी चाहिए। बाहरी जगत में यदि छूट भी गए तो अंतर्जगत के द्वंद्वों में जकड़ जाते हैं। अंतर्द्वद्वों से छुटकारा पाने के लिए अपने अंतर में अंतरयामी का दर्शन करने का पूरा प्रयास करना चाहिए। सत्संग एक श्रेष्ठ माध्यम है। जिस भी तरीके से मिले, जीवन को जरूर इससे जोड़ें।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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