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कल्‍पेश याग्निक: तंत्र सफल, गण सार्थक

 
Source: कल्पेश याग्निक   |   Last Updated 07:39(26/01/12)
 
 
 
 

विशेष संपादकीय: जब अमेरिका ने मनुष्य चांद पर उतार दिया, तब एक तीखा व्यंग्य आया। कहा गया- चांद के लिए तो हम भारतीय बेहतर हैं- क्योंकि ‘हम हवा, पानी, रोशनी, खाना और छत के बगैर भी जिंदा रह सकते हैं।’
गणतंत्र के मात्र छह दशक में ही इसी भारतीय ने देश को विश्व शक्ति बना दिया। हां, यह अलग बात है कि तंत्र चलाने वालों का क्रूर मजाक अब भी जारी है। महंगाई रोकने में पूरी तरह विफल रहने के बाद कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि ‘लोगों के ज्यादा खाना खाने के कारण खाद्यान्न की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी हुई है।’
 
इतने पर भी, महंगाई के साथ-साथ पवार बने हुए हैं। यही है हमारा गणतंत्र। महान देश। त्याग, समर्पण और बलिदान देने वाले लोग। लाभ, स्वार्थ और बलि लेने वाला तंत्र। ऐसा तंत्र चलाने वाले नेता-नौकरशाह सभी सफल। किंतु देश को मजबूत बनाने वाले लोगों का जीवन सार्थक। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि सफल और सार्थक के मध्य कोई द्वंद्व नहीं, कोई तनाव नहीं।
 
वो क्या है जो हमारे गणराज्य की सबसे बड़ी विशेषता है? कई बातें होंगी, किंतु एक गजब की बात यह है कि तंत्र वैसा ही है। गण यानी हम, निरंतर परिवर्तनशील है। तंत्र चलाने वाले उसी तरह चला रहे हैं। लोग नई-नई बातों, नई उपलब्धियों से नई ऊर्जा भर रहे हैं।
 
देखें, कैसे-‘50 के दशक में समाचार पत्रों की सुर्खियां ‘मुद्रास्फीति’ ही थी। पचास साल से यही मुख्य मुद्दा है। कृष्णमेनन के जीप सौदा घोटाले से जो हालत नेहरू सरकार की हुई, वो राजीव सरकार के बोफोर्स तोप सौदे और आज के २जी घोटाले से ज्यादा अलग नहीं थी। और लोग भ्रष्टाचार के विरोध में शांतिपूर्ण ढंग से वोट के जरिए सरकारों को सबक सिखाते रहे। अति होने पर पहली बार अन्ना हजारे के आंदोलन में सड़क पर उतरे।
 
‘48 के पाक आक्रमण से लेकर ‘62 के चीन युद्ध तक हमारे जवानों का अदम्य साहस उतना ही था जितना कारगिल युद्ध में। त्याग, समर्पण और बलिदान। सेनाओं के लिए, सैनिकों के लिए तंत्र तब भी उतना ही कंजूस था, जितना आज।
तंत्र ने नरसिंहराव सरकार के 16 मंत्रियों को 99 हजार करोड़ के घोटाले करने दिए थे, जो आज की सरकार के कोई पांच मंत्रियों के 5 लाख करोड़ के घोटालों से कुछ ही कम थे। लेकिन यही तंत्र; सैनिकों, शिक्षकों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, खिलाड़ियों और महिलाओं के वेतन में सम्मानजनकबढ़ोतरी को तैयार नहीं। किंतु ये सब इससे पीछे कहां हटे, डटे ही रहे। बढ़ते ही गए।
देश का मान बढ़ाते ही गए। हॉर्वर्ड के डीन, कैंब्रिज के ‘मास्टर’ स्टेनफोर्ड के हेड्स- सभी भारतीय। विश्व का कोई बड़ा अस्पताल नहीं, जहां भारतीय स्पर्श से लोग स्वस्थ होकर न लौट रहे हों। अपने शरीर के 80 प्रतिशत हिस्से को गला चुके डॉ. शरद दीक्षित मृत्युर्पयत नि:शुल्क इलाज करते चले गए। दुनिया के 10 बड़े डॉक्टरों की श्रद्धांजलि थी- कोई भारतीय ही ऐसा कर सकता है। त्याग, समर्पण और बलिदान।
 
तंत्र के पथभ्रष्ट होने के तो अनेक उदाहरण। गण के गड़बड़ाने तक का एक भी प्रसंग नहीं। ’60 से चारु मजूमदार, कनु सान्याल की माओवादी हिंसा शुरू हुई थी। आज बंगाल, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ इसकी चपेट में हैं। हिंसा, मंत्री-अफसर सभी नक्सलियों के साथ-साथ बने हुए हैं। निदरेष नागरिक गांव-गांव में लड़ रहे हैं। त्याग, समर्पण और बलिदान।
 
उन्हीं मुद्दों से उसी भाषा में कैसे जूझ रहे हैं नेता, इसका रोचक उदाहरण हैं- 21 साल पहले बनाया आरके लक्ष्मण का कार्टून। एक गांव की पगडंडी कैलॉग्स, वूलवर्थ, लेज़ चिप्स के विज्ञापनों से अटी पड़ी है। एक बैलगाड़ी है- जिसमें बोतलें भरी पड़ी हैं। लिखा है ‘ एन्जॉय, कोका कोला’.. पगडंडी पर पेप्सी के बोर्ड के पास लिखा है- महात्मा गांधी मार्ग। और हैरान परेशान गांधीजी उस पर गुजर रहे हैं।
 
हूबहू दृश्य है- ताजा रिटेल विवाद में। सत्ता की भाषा वैसी ही। विपक्ष की शब्दावली भी ठीक वैसी। इनके बीच पिसते छोटे-छोटे लोग। जिनसे अपेक्षा भी यही है कि वे करते रहेंगे त्याग, समर्पण और बलिदान। गणतंत्र के कुछ प्रहरियों के ऐसे ही सर्वोच्च बलिदानों के लिए उनके परिवारों को समर्पित है इस बार का गणतंत्र दिवस विशेषांक।

(लेखक दैनिक भास्‍कर समूह के नेशनल एडीटर हैं)

मार्क टुली की नजर से देखिए 62 साल पुराना भारत का गणतंत्र 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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