अफगानिस्तान में कैसे हो अमन?
वेदप्रताप वैदिक | Sep 25, 2012, 05:47AM IST

इस परिषद के अध्यक्ष अब प्रो. रब्बानी के बेटे सलाहुद्दीन हैं। प्रो. रब्बानी और सलाहुद्दीन की भाषा फारसी है और वे ताजिक हैं, जबकि तालिबान मूलत: पश्तोभाषी हैं और पठान हैं। लगभग तीन साल हो गए, लेकिन इस परिषद का काम एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है। कोई भी तालिबान इस परिषद यानी अफगान सरकार से बात नहीं करना चाहता। उनका कहना है कि पहले विदेशी फौजें हटें, तब बात करें। बात करना तो दूर, एक आत्मघाती आतंकी को प्रो. रब्बानी से मिलने के बहाने भेजकर उन्होंने उनकी हत्या करवा दी। इधर तालिबान के हमले बढ़ते ही जा रहे हैं। पिछले दिनों इन हमलों में कुछ ढील आई थी, लेकिन जबसे ओबामा ने 2014 में नाटो फौजों की वापसी की घोषणा की है, तालिबान ने अपने हमले तेज कर दिए हैं। फौज और पुलिस में पहले से काम कर रहे अनेक जवान विदेशी फौजियों और अपने अफसरों की हत्या का दुस्साहस भी करने लगे हैं। 18 सितंबर को जब मैं काबुल हवाई अड्डे पहुंचा तो विदेश मंत्रालय के अफसरों ने बताया कि अभी-अभी एक बम विस्फोट में 8-10 विदेशी कर्मचारी मारे गए हैं। ऐसा अफगानिस्तान में पहली बार हुआ कि एक महिला ने आत्मघाती विस्फोट किया और बेकसूर लोगों की जान ले ली। इसी डर के मारे विदेशी लोग काबुल जाने से कतराते हैं। भारत से मेरे अलावा वहां कोई और नहीं पहुंचा।
अपने पांच दिन के काबुल-प्रवास में मैंने देखा कि तालिबानी हमलों के डर से पूरा काबुल शहर एक छावनी बन गया है। अपना राजदूतावास हो या होटल सीरिना, चार-चार सुरक्षा दरवाजों पर जांच के बाद ही आप अंदर-बाहर आ, जा सकते हैं। होटल के अंदर हर मंजिल पर बंदूक लिए फौजी खड़े दिखाई पड़ते हैं। 2014 में नाटो फौजों की वापसी की घोषणा ने आम अफगान की घबराहट बढ़ा दी है। जमीनों और संपत्तियों के दाम गिर रहे हैं। बैंक दिवालिया हो रहे हैं। लोग अपने पैसे निकाल-निकालकर बाहर जमा करवा रहे हैं। बच्चों को विदेशों में पढ़ने भेज रहे हैं। ज्यादातर मंत्रियों और बड़े अफसरों ने मुझे बताया कि वे काबुल में अकेले रहते हैं। उनके परिवार विदेशों में हैं। सबको डर है कि सचमुच यदि नाटो फौजें 2014 में वापस चली गईं तो अफगानिस्तान में भगदड़ मच जाएगी। हालांकि राष्ट्रपति हामिद करजई और उनके विदेश मंत्री जलमई रसूल इस समय अमेरिका में हैं और एक ऐसे सुदीर्घ सुरक्षा समझौते का इंतजाम कर रहे हैं, जिसके तहत 2014 की वापसी के बाद भी अमेरिकी सुरक्षाकवच अफगान-सरकार को उपलब्ध रहे। इसके बावजूद जितने भी अफगान मंत्री, दलों के अध्यक्ष और बुद्धिजीवी मुझे मिले, उन सबका मानना था कि जब तक पाकिस्तान तालिबान को मदद देना और उकसाना बंद नहीं करेगा, अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता असंभव है। शांति सम्मेलन में पाकिस्तान के अनेक नामी-गिरामी पश्तून नेता उपस्थित थे, लेकिन उनके सामने ही अफगान वक्ताओं ने खरी-खरी सुना दी।
अपने भाषण में मैंने रब्बानी साहब के साथ अपने 45 वर्षो के संबंधों के कुछ मार्मिक संस्मरण भी सुनाए, लेकिन शांति के लिए मूलत: चार मुद्दे उठाए। पहला, अफगानिस्तान में कम से कम 5 लाख जवानों की फौज एक वर्ष में खड़ी की जाए, ताकि तस्करी, अपराध और आतंक के लिए जवान उपलब्ध ही न हों। विदेशी फौजियों का अफगानिस्तान में नामोनिशान ही न हो। इस शुद्ध अफगान फौज को खड़ी करने का जिम्मा भारत ले। दूसरा, अफगानिस्तान अपने खनिजों के अपार भंडारों को खोल दे, ताकि उसकी ही नहीं, संपूर्ण दक्षिण एशिया की गरीबी दूर हो सके। तीसरा, बाकायदा राजनीतिक दलों की स्थापना हो, ताकि संविधान द्वारा निर्मित सरकार, संसद और न्यायपालिका की छत को थामने के लिए सशक्त स्तंभ मिल सकें और चौथा, तालिबान अपना जबर्दस्त राजनीतिक मोर्चा बनाएं और सभी वर्तमान अफगान नेताओं को लोकतांत्रिक चुनौती दें। गांधी के रास्ते पर चलें। हिंसा के जरिए न अफगान सरकार जीत सकती है और न ही तालिबान। सरकार और तालिबान, दोनों ही ‘बुलेट’ का रास्ता छोड़ें और ‘बैलेट’ का रास्ता पकड़ें। यदि दोनों ही एक-दूसरे को हथियारों के जोर पर खत्म करना चाहेंगे तो अफगानिस्तान ही खत्म हो जाएगा। यदि अफगानिस्तान जलेगा तो उसकी आंच भारत पर भी आएगी। भारत झुलसे बिना नहीं रहेगा। भारत और अफगानिस्तान दोनों ही सलामत रहें और पाकिस्तान भी सुरक्षित रहे, इसके लिए जरूरी है कि सभी संघर्षरत पक्ष नए सिरे से सोचें।






