यदि हम चाहें कि सब हमारे जैसे हो जाएं तो यह संभव नहीं है
Source: पं. विजयशंकर मेहता | Last Updated 00:08(25/01/12)
जीने की राह.. दुखी होने के लिए अब बड़ी घटनाओं की जरूरत नहीं है। छोटी-सी बात भी आपको बड़े से बड़ा दुख दे जाएगी और बड़ी से बड़ी घटनाएं भी छोटा-सा सुख नहीं दे पाएंगी, क्योंकि सारा मामला भीतरी समझ का है। आर्ट ऑफ लिविंग के श्रीश्रीरविशंकर कहते हैं, जरा भीतर उतरिए, तो समझ में आ जाएगा कि यह जगत परिवर्तनशील है। दिमाग में, मन में, अनुभव में जाकर हम देख लें, तब हम छोटी-छोटी बातों को लेकर दुखी नहीं होंगे। नहीं तो मन में लगातार एक अफसोस बना रहता है कि उसने ऐसा किया, इसने ऐसा क्यों कहा, इसे ऐसा नहीं करना चाहिए।
सारा समय तर्क में लगे रहते हैं। यह तर्क एक माया है। हर आदमी आपके जैसा नहीं हो सकता। फिर भी हम चाहते हैं कि सब हमारे जैसे हो जाएं। यह संभव नहीं है। असंभावनाओं और अनहोनी बातों को लेकर हम बैठ जाते हैं, इसलिए दुखी हो जाते हैं।
जो घटना हो चुकी है, उसको लेकर हम बैठ जाते हैं और एक कल्पना जगत में घूम आते हैं। लेकिन इससे क्या पाएंगे हम? फिर जीवन में हम कब खुश रहेंगे? अब देखो, आप विदेश में रहते हैं। हिंदुस्तान में किसी से पूछो, उनका सपना है कि विदेश में जाकर बस जाऊं।
जैसे स्वर्ग में चले जाएंगे। वहां भी चले गए तो क्या होगा? कुछ आराम मिलेगा। उसके आगे क्या? इन बातों को विवेकपूर्ण ढंग से हमंे देखना चाहिए। जब विवेक से देखते हैं तो ये मन पर छाए हुए बादल छंटकर दूर हो जाएंगे। फिर एकदम जागृति, प्रसन्नता, प्रेम। जीवन ऐसा प्रेम से चमक जाएगा, फिर देखिए आनंद ही आनंद है। इसलिए मन पर काम किया जाए।