मानव बल में प्रभु की कृपा जुड़ जाए तो वह सर्वशक्तिमान होगा
Source: पं. विजयशंकर मेहता | Last Updated 00:08(24/01/12)
जीने की राह.. यह कुछ अलग करने का समय है। इस समय प्रतिस्पर्धा की मांग है कि अव्वल ही न रहा जाए, कुछ अनूठा भी किया जाए। हमारी और दूसरों की मांगें असीम हो गई हैं। जल्दी चाहिए और बहुत चाहिए, ऐसा उद्देश्य छोटे-बड़े सबका बन गया है। नए प्रबंधन के युग में कहा जाता है कि सर्वश्रेष्ठ पाने के लिए अहंकार भी सहारा बन जाता है।
कुछ लोग अहंकार को अपनी प्रेरणा मानते हैं। उनका कहना है कि अहंकार की पूर्ति के लिए हम और अधिक परिश्रम करते हैं। अहंकार को ठीक से समझा जाए तो शायद इसको मिटाकर भी वे सारी उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती हैं, जिनकी आज संसार में मांग है।
सबसे सरल तरीका है अपने अलावा किसी और शक्ति को भी स्वीकार करना। सुंदरकांड में जब अशोक वाटिका में सीताजी ने हनुमानजी से यह सवाल किया कि क्या तुम छोटे-छोटे वानर इन राक्षसों का मुकाबला कर पाओगे? अपना प्रताप बताने में अहंकार का खतरा था, यह हनुमानजी जानते थे। उन्होंने बड़ी सफाई से कहा - सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।। हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है, अत्यंत निर्बल भी महान बलवान को मार सकता है। मनुष्य के बल में परमात्मा की कृपा जुड़ जाए तो वह सर्वशक्तिमान बन जाएगा। हनुमानजी ने अहंकार भी गला दिया और अपने बल की संभावनाओं को प्रदर्शित भी कर दिया। यह अहंकार से बचने का तरीका है। सांसारिक अहंकार तो नजर आता है, परंतु धार्मिक अहंकार बारीक होकर पकड़ में नहीं आता।