संपादकीय.. हालांकि एक सशक्त लोकपाल की जरूरत अपनी जगह कायम है, लेकिन 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में मुकदमे की अनुमति संबंधी सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने यह स्पष्ट किया है कि इरादा सही हो, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की पहले से मौजूद कानूनी व्यवस्था भी अपर्याप्त नहीं है।
बात कुल मिलाकर ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की मंशा और इच्छाशक्ति पर आ जाती है। पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अर्जी को लटकाए रखने के संबंध में यूपीए सरकार की निर्णय प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियां की हैं।
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री को निजी रूप से क्लीन चिट दी है, लेकिन सरकार के मुखिया के रूप में वर्तमान एवं भावी प्रधानमंत्री इसे ऐसे गंभीर प्रकरणों से बेखबर बने रहने का लाइसेंस नहीं मान सकते। अंतत: सरकार के तमाम निर्णयों एवं कार्यो की जवाबदेही प्रधानमंत्री पर आती है, जिससे वे मुक्त नहीं हो सकते। बहरहाल, 2जी घोटाले में एक और चोट खाने के बाद अब यूपीए सरकार के लिए बेहतर यही होगा कि वह भ्रष्टाचार निरोधक कानून से संबंधित कोर्ट के आदेशों को विधायिका के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका के अतिक्रमण का मुद्दा न बनाए।
बल्कि उचित तो यह है कि वह इस कानून में मुकदमे की मंजूरी पर फैसला लेने की उस समयसीमा का प्रावधान करे, जिसके लिए कोर्ट ने आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे फैसले चार महीने में लेने को कहा है और व्यवस्था दी है कि ऐसा न करने पर यह मान लिया जाएगा कि मुकदमे की इजाजत दे दी गई है।
इस फैसले का संभवत: सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऐसी अर्जी देने के लिए कोर्ट ने आम नागरिकों को सक्षम करार दिया है। इस संदर्भ में उसकी यह टिप्पणी गौरतलब है कि भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे दर्ज कराना नागरिकों का मूल अधिकार है। साफ है, इस निर्णय ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के नए रास्ते खोले हैं और भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष को बल प्रदान किया है। यह स्वागतयोग्य फैसला है। केंद्र एवं तमाम राज्य सरकारों को चाहिए कि वे ससम्मान इसे स्वीकार करें।