Home » Abhivyakti » Jeene Ki Rah » The Balance Of Mind

बात में हो दिल-दिमाग का संतुलन

पं. विजयशंकर मेहता | Jan 08, 2013, 00:12AM IST
कुछ समझना हो तो दिमाग का उपयोग करना पड़ता है, सुनना हो तो कान लगाने पड़ते हैं और देखने के लिए आंखों से काम लेना पड़ता है। लेकिन समाज में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जहां इन तीनों के अभाव में काम लेना पड़ता है और वह है दिल से काम लेना।
 
कुछ लोगों की बातें दिल से ही समझ में आएंगी, क्योंकि ऐसे लोग दिल से ही कहते हैं। लेकिन यदि कहने वाला भी केवल दिमाग से काम करे तो भी सामने वाले का नुकसान होगा। रावण के साथ भी यही होने जा रहा था। हनुमानजी के लंका से जाने के बाद रावण की पत्नी मंदोदरी ने उसे खूब समझाया था कि श्रीराम समुद्र तट पर पहुंच चुके हैं।
 
रावण ने न तो मंदोदरी की बात ठीक से सुनी और न ही इस सूचना पर ध्यान दिया, बल्कि जब वह अपनी सभा में आकर बैठा तो उसके मंत्रियों ने इस सूचना पर रावण को हंसते हुए कहा था, आपने देवताओं को जीत लिया, अब मनुष्य की क्या औकात।
 
तुलसीदासजी ने पंक्ति लिखी है - सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।। मंत्री, वैद्य और गुरु ये तीनों यदि भय या लाभ की आशा से हित की बात न कहकर प्रिय बोलते हैं; तो क्रमश: राज्य, शरीर और धर्म- तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है। तुलसीदासजी कह रहे हैं- अपने सचिव यानी सलाहकार, वैद्य मतलब डॉक्टर और गुरु इन तीनों को केवल दिमाग से नहीं बोलना चाहिए। इन्हें दिल को जोड़कर अपनी बात रखनी चाहिए।
 
आदमी जब अपने निर्णय से थक जाता है, तब वह इनका सहारा लेता है। इसलिए दोनों ही पक्षों को चाहिए कि दिल-दिमाग के संतुलन के साथ हितकारी बात कहें और सुनें। 
BalGopal Photo Contest
आपके विचार
 
अपने विचार पोस्ट करने के लिए लॉग इन करें

लॉग इन करे:
या
अपने बारे में बताएं
 
 

दिखाया जायेगा

 
 

दिखाया जायेगा

 
कोड:
2 + 9

 
विज्ञापन

बड़ी खबरें

BalGopal Photo Contest

रोचक खबरें

विज्ञापन

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

स्पोर्ट्स

जोक्स

पसंदीदा खबरें

फोटो फीचर

 
Email Print Comment