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जीवन के ये अंतिम उत्सव..

 
Source: खुशवंत सिंह   |   Last Updated 00:07(14/01/12)
 
 
 
 
धर्म आधारित छुट्टियों, जैसे क्रिसमस, दिवाली, ईद वगैरह का मजा केवल उन्हीं के द्वारा लिया जा सकता है, जो उस धर्म के मानने वाले हों, जबकि ऐसे अवसरों पर बाकी लोग महज तमाशबीन रह जाते हैं। दिवाली व होली ऐसे त्योहार हैं, जो हिंदू और सिख दोनों मनाते हैं, लेकिन गुरुपुरब केवल सिखों द्वारा ही मनाया जाता है।

मुस्लिमों की तीन ईद होती हैं : ईदुलफितर, ईदुज्जुहा और ईदे मिलादुन्नबी। ये त्योहार केवल मुस्लिमों द्वारा ही मनाए जाते हैं। ठीक इसी तरह क्रिसमस विशुद्ध रूप से ईसाइयों का त्योहार है और इसे प्रभु यीशु के जन्म उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लेकिन अब यह एक ऐसा त्योहार बनता जा रहा है, जिसे पूरी दुनिया के लोग मनाते हैं, फिर चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों।

पश्चिम के शहरी क्षेत्रों में क्रिसमस से एक माह पूर्व ही खरीदारी शुरू हो जाती है। अन्य चीजों के अलावा बड़े पैमाने पर तोहफे भी खरीदे जाते हैं। शॉपिंग मॉल्स को खूब अच्छी तरह सजाया जाता है और वे देर रात तक खुले रहते हैं। क्रिसमस के जश्न के बाद अगले दिन बच्चे बड़े उत्साह से अपने-अपने गिफ्ट बॉक्स खोलकर देखते हैं। इसीलिए इस दिन को बॉक्सिंग डे भी कहा जाता है। बच्चों को बताया जाता है कि इन्हें सांता क्लॉज बारहसिंघों की अपनी स्लेज पर लादकर लाया था। क्रिसमस ट्री पर बड़े दिन के ये तोहफे वो ही टांग गया है।

चूंकि मुझे पता नहीं है कि मैं अगला क्रिसमस मना पाऊंगा या नहीं, इसलिए मैंने तय किया था कि इस बार का क्रिसमस बड़ी धूमधाम से मनाऊंगा। मुझे दो फीट का एक सांता क्लॉज नुमा खिलौना भी मिला, जिसने सभी सांता क्लॉज की तरह लाल-सफेद कपड़े पहन रखे थे।

एक बटन दबाने पर वह उठ बैठता और जिंगल बेल गाने लगता। लेकिन पता है एक धर्म विशेष के उत्सव का यह खिलौना कहां बना था? वह कम्युनिस्ट चीन में बना था। चीन केवल सांता क्लॉज ही नहीं बनाता, वह भारत के लिए गणोश प्रतिमाएं भी बनाता है। कार्ल मार्क्‍स ने कहा था कि धर्म अफीम है तो ऐसे में चीन को क्या कहा जाए? अफीम का सौदागर?

खैर, मैं अपनी कहानी पर लौटता हूं। इस बार के क्रिसमस पर मुझे सांता क्लॉज के खिलौने के अलावा एक छोटा-सा क्रिसमस ट्री भी मिला। उसकी पत्तियां चमकीली थीं और उसके सामने छह अलग-अलग रंगों की मोमबत्तियां भी थीं। हम सभी ने क्रिसमस कैरोल्स बजाने शुरू कर दिए : ‘नोएल, नोएल, बॉर्न इज द किंग ऑफ इजरायल।’

हमारे साथ क्रिसमस का जश्न मनाने आए किंग्स कॉलेज कैम्ब्रिज के लड़कों ने भी ‘साइलेंट नाइट, होली नाइट’ जैसे दर्जनों गीत गाए। फिर हमने होटल ला मेरिडियन का लजीज खाना खाया, जो होटल प्रबंधन ने मेरे लिए मुफ्त भिजवाया था। इसके लिए मैं होटल मालिक श्रीमती चरणजीत सिंह का शुक्रगुजार हूं।

एक और चीज का जिक्र करना तो मैं भूल ही गया। मैं मिसल्टो (आकाश बेल) की बात कर रहा हूं, जो दरवाजे पर लटकी हुई थी। कहते हैं कि उसके नीचे खड़े होकर आप चाहे जिसका आलिंगन कर सकते हैं। बहरहाल, मैंने मिसल्टो के बिना ही कइयों पर अपना प्रेम लुटाया। अलविदा, सांता क्लॉज! कौन जाने, अब तुमसे भेंट हो न हो!

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जानलेवा कैंसर :

मैं मीनाक्षी चौधुरी को काफी समय से जानता हूं। गर्मियों के दौरान जब मैं कसौली में था, तो वे अपने पति के साथ मुझसे मिलने आई थीं। उन्होंने यह संकल्प लिया था कि उनके गृहराज्य हिमाचल प्रदेश को भारत के नक्शे पर वह मुकाम दिलाना है, जिसका वह हकदार है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के बारे में अनेक किताबें भी लिखी हैं, जिनमें शामिल हैं : ‘ग्रेट स्टोरीज ऑफ शिमला हिल्स’, ‘लव स्टोरीज ऑफ शिमला हिल्स’, ‘व्हिपरिंग देवदार्स’ वगैरह। हाल ही में मुझे रूपा से प्रकाशित उनकी नई किताब ‘सनशाइन : माय एनकाउंटर विद कैंसर’ मिली। मुझे गहरा झटका लगा।

आखिर एक युवा, उत्साहपूर्ण और खुशमिजाज महिला कैसे इस गंभीर और जानलेवा रोग की शिकार हो सकती है? लेकिन मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि उन्होंने कैंसर का सफल इलाज करवा लिया है। कम से कम वे तो इस जानलेवा रोग से मुक्त हो गईं। मैं आशा करता हूं कि उनकी तरह कैंसर के सभी मरीज इस रोग से निजात पा जाएं। मैं यह भी उम्मीद करता हूं कि मीनाक्षी संकट की इस घड़ी से उबरने के बाद एक स्वस्थ और प्रसन्नतापूर्ण जीवन बिताएंगी।

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दोस्त के लिए भी एक :

सुखविंदर और दुखविंदर गहरे दोस्त थे। हर शाम एक बार में उनकी भेंट होती। वे अपनी तय टेबल पर एक-दूसरे के आमने-सामने जाकर बैठ जाते। दो गिलास रम का ऑर्डर देते, उसे एक घूंट में पीते और वहां से चले जाते। यह क्रम वर्षो तक जारी रहा। एक दिन, जब वे बार से निकल रहे थे, अचानक सुखविंदर लड़खड़ाकर गिर पड़ा। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

दुख में डूबा हुआ दुखविंदर अगले दिन अकेले बार गया और दो गिलास रम का ऑर्डर दिया। जब वेटर दो गिलास रम ले आया, तो दुखविंदर ने पहले अपनी कुर्सी पर बैठकर एक गिलास रम पी और फिर सुखविंदर की कुर्सी पर गया और उसके हिस्से की रम भी पी गया। वेटर ने जिज्ञासावश पूछा : ‘सर, इसका क्या मतलब हुआ?’ दुखविंदर ने जवाब दिया : ‘सुखविंदर अब इस दुनिया में नहीं रहा, लेकिन अगर मैंने बार में आकर रोज उसके हिस्से की शराब नहीं पी, तो उसकी आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी।’

यह क्रम भी एक साल तक जारी रहा। एक शाम वह बार में आया और केवल एक गिलास रम का ऑर्डर दिया। उसने सुखविंदर की कुर्सी पर बैठकर रम पी और वहां से जाने लगा। वेटर ने फिर जिज्ञासावश पूछा : ‘सर, आज एक ही गिलास क्यों?’ दुखविंदर ने जवाब दिया :

‘देखो भाई, मेरे दिन अब पूरे होने वाले हैं। मैंने तय किया है कि अब मैं कोई पाप न करूंगा। चूंकि शराब पीना भी पाप है, इसलिए मैंने शराब भी छोड़ दी है। अब मैं केवल अपने दोस्त की आत्मा की शांति के लिए उसके हिस्से की शराब पीने आया करूंगा।’-लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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