मधुर वाणी द्वारा बड़ी से बड़ी उपलब्धि पाई जा सकती है
Source: पं. विजयशंकर मेहता | Last Updated 00:00(31/01/12)
जीवन में विपरीत परिस्थितियों में शब्दों का उपयोग बड़े काम का होता है। स्वयं को समझाना हो या दूसरों को, शब्दों का उपयोग करते समय उसमें चार बातों का समावेश करिए। सुंदरकांड में सीताजी से बातचीत करते हुए जब हनुमानजी ने भगवान के प्रताप का वर्णन किया तो सीताजी आश्वस्त हो गईं। हालांकि उन्हें लग रहा था कि रावण के राक्षस विशाल हैं और रामजी के बंदर बहुत छोटे, लेकिन हनुमानजी के शब्दों ने सीताजी के भीतर विजय के प्रति आश्वासन भर दिया। मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।। आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमानजी की वाणी सुनकर सीताजी के मन में संतोष हुआ। उन्होंने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ। हनुमानजी की वाणी में तुलसीदासजी ने चार बातें बताईं। जीवन में जब संकट की स्थिति हो तब हमारे शब्दों में भक्ति, प्रताप, तेज और बल होना चाहिए। भक्ति हमारे शब्द और आचरण में मेल बनाती है। प्रताप का अर्थ है जबर्दस्त पुरुषार्थ। यह बोलता ही नहीं, करता भी है। तेज हमारे शब्दों में पवित्रता लाता है और बल का अर्थ है अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की वृत्ति। चूंकि हनुमानजी स्वयं भी बहुत अच्छे वक्ता थे, इसलिए वे वाणी का उपयोग किस जगह कैसा करना है, इसमें दक्ष रहे। परिणाम यह हुआ कि सीताजी के मन में संतोष पैदा हो गया और हनुमानजी को बल और शील का वरदान मिला। वाणी के माध्यम से कितनी बड़ी उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है, यह इसका उदाहरण है।
humarehanuman@gmail.com