आम धारणा यही रही है कि यूपीए में दो सत्ता केंद्र हैं, लेकिन वास्तव में सत्ता केंद्र दो नहीं तीन हैं। यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी सर्वोच्च नेत्री हैं, लेकिन उनके पास प्रशासनिक उत्तरदायित्व नहीं हैं। यह जिम्मेदारी वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को सौंपी गई थी और कैबिनेट का प्रमुख होने के साथ ही उन्हें एक सीईओ-नुमा भूमिका भी निभानी थी।
लेकिन इन दोनों के साथ ही यूपीए में एक तीसरा सत्ता केंद्र भी था। भले ही यह तीसरा कोण बहुत जाहिर न रहा हो, लेकिन उसके महत्व से कभी इनकार नहीं किया जा सकता था। यूपीए में प्रणब मुखर्जी की भूमिका हमेशा एक वरिष्ठ मंत्री से अधिक रही है।
वास्तव में वे यूपीए के सीओओ (चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर) हैं और यह उनकी जिम्मेदारी रही है कि गठबंधन की राजनीति के समक्ष मुंह बाए खड़ी चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए। पिछले सात सालों से श्री मुखर्जी यूपीए द्वारा लिए जाने वाले लगभग हर राजनीतिक निर्णय या महत्वपूर्ण नीति के लिए ‘गो टु पर्सन’ रहे हैं।
विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक मसलों का हल करने के लिए बनाए गए 32 मंत्रियों के समूह के वे अध्यक्ष थे। अब मंत्रियों की संख्या 32 से घटकर 10 तक पहुंच गई है, लेकिन इससे यूपीए में श्री मुखर्जी की भूमिका और महत्व कम नहीं हो जाते।
यूपीए में संकट की किसी भी घड़ी में 13 तालकटोरा रोड स्थित मुखर्जी का निवास केंद्र बिंदु बन जाता है, जबकि इसकी तुलना में 7 रेसकोर्स रोड कभी-कभी परिधि पर ही बना रहता है। इससे यूपीए सिस्टम की सीमाएं ही उजागर होती हैं कि एक व्यक्ति से यह अपेक्षाएं की जा रही हैं कि वे तेलंगाना से लेकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक हर समस्या का समाधान करेंगे।
यह एक ऐसे सिस्टम की सीमाएं हैं, जिसके प्रधानमंत्री ने कभी कोई लोकप्रिय चुनाव नहीं जीता और जिसकी अध्यक्षा रोजमर्रा की राजनीति की कठोरताओं से दूरी बनाए रखना पसंद करती हैं। शायद, यह व्यवस्था यूपीए के दोनों शीर्ष व्यक्तियों के अनुरूप है।
एक उत्कृष्ट प्रशासनिक अधिकारी के रूप में डॉ सिंह कभी भी गठबंधन की राजनीति की रस्साकशी को लेकर सहज नहीं हो पाए। प्रधानमंत्री की शैली कुछ इस तरह की है कि वे राजनीतिक निर्णयों के लिए सीधे जिम्मेदारी लेने से बचना पसंद करते हैं।
यहां भारत-अमेरिका एटमी डील एक महत्वपूर्ण अपवाद है। डॉ सिंह के लिए एक वांछित विकल्प यह रहा है कि उनके स्थान पर मंत्रियों के एक समूह द्वारा निर्णय लिया जाए। श्रीमती गांधी ने भी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के जरिये ही राजनीतिक तंत्र में हस्तक्षेप करना पसंद किया है।
यह परिषद ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जिन्हें किन्हीं मतदाताओं की चिंता करने की जरूरत नहीं है, लेकिन जिनके पास ये अधिकार और स्वतंत्रता है कि वे सरकार के निर्णयों को प्रभावित कर पाएं।
ऐसी स्थिति में श्री मुखर्जी यूपीए के सबसे बड़े संकटमोचक बनकर तो उभरे, लेकिन इसके साथ ही उनसे एक ‘लक्ष्मणरेखा’ के भीतर रहने की अपेक्षा भी की जाती रही। वह रेखा, जो यूपीए के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा तय की गई है।
उदाहरण के तौर पर वे प्रधानमंत्री बनने की कामना नहीं कर सकते। यूपीए नेतृत्व प्रथम परिवार के प्रति वफादारी की बुनियाद पर ही संचालित होता है और किन्हीं कारणों से 10 जनपथ हमेशा से श्री मुखर्जी के प्रति सतर्क ही रहा है।
संभवत: यह इतिहास का बोझ है। वह कहानी, जो कभी पूरी तरह सत्यापित नहीं हो सकी, कि किस तरह उन्होंने 1984 में इंदिरा गांधी का उत्तराधिकारी बनने का प्रयास किया था, आज भी उनके आड़े आ जाती है। कांग्रेस पार्टी में महत्वाकांक्षा से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वह विनम्रता और दासता का चोला पहनकर सामने आए और इस ‘लॉयल्टी टेस्ट’ में मुखर्जी विफल माने जाते रहे हैं।
इसके बावजूद पिछले सात सालों में यूपीए की इस शीर्ष त्रयी ने अंदरूनी समीकरणों का यथासंभव समाधान किया है। यूपीए में जहां श्रीमती गांधी मातृशक्ति की तरह एकता की प्रतीक हैं, वहीं डॉ सिंह ईमानदार सीईओ और श्री मुखर्जी हमेशा तत्पर रहने वाले डिप्टी।
इन तीनों के प्रयासों से ही यूपीए की नैया अभी तक तैर रही है। श्रीमती गांधी की अस्वस्थता का यह अर्थ था कि वे कुछ समय तक पार्टी का ‘चेहरा’ होने की अपनी स्वाभाविक भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाएंगी।
घोटालों की श्रंखला ने ईमानदारी के इंडेक्स पर प्रधानमंत्री के एकाधिकार को कमजोर कर दिया और कैबिनेट में उभरे असहमति के सुरों ने संकट की स्थिति का सामना करने में श्री मुखर्जी की क्षमता को भी प्रश्नांकित किया।
उदाहरण के तौर पर पूछा जाना चाहिए कि आखिर क्यों उन्हें एक ‘प्रतिनिधिमंडल’ के मुखिया के रूप में बाबा रामदेव की अगवानी करने भेजा गया? और क्यों २जी विवाद में उन्हें प्रेस बयान देने के लिए लगभग विवश किया गया, जबकि कुछ दिनों पूर्व ही उन्होंने कहा था कि मामला अभी विचाराधीन है?
समस्या का एक कारण शायद मंत्रिपद के व्यक्तिगत उत्तरदायित्वों और ‘सामूहिक’ कैबिनेट उत्तरदायित्वों के बीच की रेखा का धुंधला जाना भी है। निर्णय प्रक्रिया में मनमानी और अहंकार भी देखा गया है। अन्ना हजारे की गिरफ्तारी और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान सरकार से हुई गलतियां इसका एक अच्छा उदाहरण है।
आज भी हम यह नहीं जानते कि अन्ना हजारे को गिरफ्तार करने का अंतिम निर्णय किसने लिया था और क्या उसमें सभी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों की सहमति थी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी को जरूर अन्ना पर अंगुली उठाने के लिए सॉफ्ट टारगेट बनाया गया हो, लेकिन यह विश्वास करना कठिन है कि वे अपने विवेक से ही बोल रहे थे।
इसी तरह 2जी मामले में यह मान लेना भी बेतुका होगा कि राजा कैबिनेट मंत्रियों और प्रधानमंत्री की उपेक्षा कर मनमर्जी से काम कर रहे थे। वास्तव में श्री मुखर्जी के प्रति सहानुभूति का अनुभव होता है। वे कई मायनों में पुरानी शैली के उन नेताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके लिए राजनीति एक फुलटाइम काम है।
यह यूपीए नेतृत्व की दयनीय स्थिति ही है कि राजनीतिक उत्तरदायित्व से अन्य व्यक्तियों द्वारा दूरी बनाए रखने का खामियाजा बार-बार उन्हें भुगतना पड़ा है।