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मौजूदा वक्त की जरूरत!

 
Source: चेतन भगत   |   Last Updated 00:24(15/12/11)
 
 
 
 
विज्ञान या तकनीकी पृष्ठभूमि वाले कुछ खास किस्म के लोगों के लिए आमतौर पर एक किंचित निंदात्मक शब्द का उपयोग किया जाता है : ‘नर्ड’। नर्डस वे होते हैं, जो अकादमिक गतिविधियों में डूबे रहते हैं। वे इंटेलीजेंट माने जाते हैं, लेकिन सामाजिक मामलों में वे आमतौर पर अनाड़ी साबित होते हैं।

वे वास्तविक जगत की हलचलों से दूर समीकरणों और फामरूलों में खोए रहते हैं। अलबत्ता यह बात तकनीकी पृष्ठभूमि वाले हर व्यक्ति पर लागू नहीं होती। बहरहाल, चूंकि मैं खुद उस प्रजाति से ताल्लुक रखता हूं, इसलिए मैं विनम्रतापूर्वक यह स्वीकार करता हूं कि दुनिया में इतनी तादाद में नर्डस हैं कि उन्हें लेकर एक आम सिद्धांत गढ़ा जा सके। तकनीकी/विज्ञान की पृष्ठभूमि वाले हम जैसे लोगों के लिए किसी पार्टी में अजनबियों से बतियाने की तुलना में डिफ्रेंशियल केलकुलस को सुलझाना कहीं सरल होता है।

मुझे जीवन के विभिन्न पड़ावों में नर्ड का तमगा मिला है, खासतौर पर मुझे ठुकराने वाली महिलाओं की ओर से (जैसे कि ‘तुम्हारे जैसे नर्ड के साथ होने से तो बेहतर है कि मैं एक नन बन जाऊं’ या ‘तुम फिजिक्स के फामरूले सुलझाओ नर्ड, मैं एक ‘स्टीफेनियन’ के साथ जा रही हूं।’) कई बार नर्डस के लिए दुनिया की वास्तविक गतिविधियों के साथ तालमेल बैठाना मुश्किल हो जाता है। वे समस्याएं सुलझाना पसंद करते हैं, लेकिन यदि वे किन्हीं निर्धारित स्टेप्स के बाद जवाब न खोज पाएं, तो असहज होने लगते हैं।

लिहाजा, नर्ड के लिए यह पता लगाना आसान होता है कि स्पेस में रॉकेट कैसे लॉन्च होता है, लेकिन उसके लिए इस तरह के सवालों का जवाब ढूंढ़ पाना टेढ़ी खीर साबित होता है कि ‘फलां लड़की को कैसे आकर्षित किया जाए?’ या अगर गंभीर मसलों की बात करें तो ‘भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान कैसे खोजा जाए?’ या ‘देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति में इतना गड़बड़झाला क्यों है?’

मैं स्वीकार करता हूं कि हम अपनी कठोर किंतु संकीर्ण वैज्ञानिक शिक्षा के कारण व्यक्तिपरक समस्याओं का समाधान कठिन पाते हैं। बहरहाल, अपनी प्रजाति के दोषों को स्वीकार करने के बाद अब मैं मानविकी श्रेणी के अपने बिरादरों के बारे में भी बात करना चाहूंगा। लिहाजा, देवियो और सज्जनो, मुझे अनुमति दीजिए कि मैं एक नई प्रजाति से आपको परिचित कराऊं, नर्ड की ही तर्ज पर एक नई श्रेणी यानी ‘लिबरल आर्ट्स’ पृष्ठभूमि वाले हमारे भाई-बंधु : ‘लर्डस’। लर्डस वे तथाकथित ‘लिबरल आर्ट्स’ या ‘आर्ट्स’ स्टूडेंट्स हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे सामाजिक समस्याओं के प्रति खुले विचारों वाले और विजनरी होते हैं। वे थिंक टैंक कमेटियों में बैठते हैं और गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए बहस करते हैं। दुनिया-जहान के विषयों के बारे में होने वाली कांफ्रेंसों में ४५ मनट की स्पीच देने वाले भी लर्डस ही होते हैं। लर्डस अंग्रेजी चैनलों पर होने वाली डिबेट्स में पाए जा सकते हैं, लेकिन मनोरंजन चैनलों पर कभी नहीं।

नर्डस सार्वजनिक मंच पर जाकर बोलने के विचार से ही थरथराने लगते हैं, लेकिन उनके विपरीत लर्डस किसी भी विषय पर धुआंधार बोल सकते हैं। जब वे बोलते हैं, तो उनकी बातें बुद्धिजीवियों जैसी मालूम होती हैं अलबत्ता उनके बिंदु हमेशा स्पष्ट नहीं होते। जब वे ‘यह मौजूदा वक्त की जरूरत है’ जैसे जुमले बोलते हैं तो उनके श्रोतागण रोमांचित हो उठते हैं।

लर्डस यह अच्छी तरह समझते हैं। वे ऐसी पेचीदगियां भी समझ सकते हैं, जिन्हें कोई नर्ड कभी नहीं समझ सकता। लेकिन, जहां नर्डस समाधानों से प्रेम करते हैं, वहीं उनके विपरीत लर्डस अपनी तमाम बुद्धिमत्ता और ज्ञान के बावजूद समाधानों से घृणा करते हैं, क्योंकि समाधान का अर्थ होगा कि किसी समस्या को सुलझाने के लिए निर्देशों का एक सेट मौजूद है और यदि ऐसा है तो फिर बहस करने से क्या फायदा?

इसलिए यदि भ्रष्टाचार की समस्या के समाधान के लिए लोकपाल बिल को एक प्रारंभिक चरण बताया जाता है तो लर्डस को यह बात रास नहीं आएगी, क्योंकि उनके अनुसार ‘मौजूदा वक्त की जरूरत’ यह है कि भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर दिया जाए। बहरहाल, ऐसा कैसे होगा, यह उनकी चिंता का विषय नहीं है।

लिहाजा यदि महंगाई को काबू में लाने के लिए सरकारी सब्सिडियों में कटौती और बुनियादी ढांचे से संबंधित उत्पादकता बढ़ाने वाले प्रोजेक्ट प्रस्तावित किए जाते हैं तो लर्डस यह कहते हुए इन्हें खारिज कर देंगे कि ‘यह मामला इतना सरल नहीं है’ और ‘भारत को इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता’। लर्डस का काम है समस्याओं को समझना (और ऐसा करते हुए दुनिया को यह बताना कि वे कितने स्मार्ट हैं)। लेकिन समाधानों से उनका कोई वास्ता नहीं। वह नर्डस का काम है।

लर्डस की उत्पत्ति कहां होती है? वे आमतौर पर हमारी दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली की उपज होते हैं, जो किसी चीज को अमल में लाने से ज्यादा उसके बारे में जानने पर जोर देती है। मानविकी संकाय में शिक्षा के साधन और तौर-तरीके पुरातन हैं। समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र जैसे अद्भुत विषयों में स्नातकोत्तर डिग्री अर्जित करने वालों के पास ज्ञान तो बहुत होता है, लेकिन वे भारतीय संदर्भ में उस ज्ञान का उपयोग करने में कठिनाई अनुभव करते हैं और एक निश्चित समाधान खोज पाना तो उनके लिए आमतौर पर दूर की कौड़ी ही होता है।

निश्चित ही लिबरल आर्ट्स की पढ़ाई करने वाला हर विद्यार्थी लर्ड नहीं होता, ठीक वैसे ही, जैसे तकनीकी शिक्षा पाने वाला हर विद्यार्थी नर्ड नहीं होता। बहरहाल, अब यह स्वीकारने का समय आ गया है कि दोनों ही श्रेणियों में बुद्धिमान किंतु अकुशल व्यक्ति मौजूद हैं। जहां नर्डस को समस्याओं का समाधान करने की अपनी क्षमता का उपयोग वास्तविक जीवन में करना चाहिए, वहीं लर्डस को उपदेश देने के अलावा समस्याओं का समाधान करना भी सीखना चाहिए।

कला और विज्ञान संकाय मनुष्य द्वारा किए गए विभाजन हैं, लेकिन आगे बढ़ने के लिए हम भारतीयों को दोनों ही संकायों के गुणों को सीखकर उन्हें अपने जीवन में उतारना चाहिए। मैं तो यही कहूंगा कि नर्डस और लर्डस अपनी लड़ाई को विराम दें और एक-दूसरे से कुछ सीखें। आखिर, ‘मौजूदा वक्त की जरूरत’ भी तो यही है! -लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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