अधूरी गाथाओं से क्या हासिल?

हाल ही में पेरिस के दस दिन के प्रवास से लौटने के बाद मैंने पाया कि यहां पर मीडिया का सुर कुछ और तेज हो गया है। हालांकि यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में जिस तरह नित-नए घोटाले सामने आ रहे हैं, उसमें यह कोई आश्चर्यजनक बात भी नहीं है।
हाल ही में एक खुलासा अरविंद केजरीवाल द्वारा किया गया, जिसने एक बार फिर मीडिया को उत्तेजित कर दिया। दरअसल ऐसे ही माहौल में पत्रकारिता फलती-फूलती है। मगर यहां पर हमें अच्छी पत्रकारिता के प्रमुख नियम को नहीं भूलना चाहिए, जो कहता है- 'कभी भी गेंद से अपनी निगाहें नहीं हटाएं। 'वैसे जब आपके आस-पास इतना कुछ घटित हो रहा हो, तो ऐसा करना आसान भी नहीं होता, क्योंकि खबरों के दीवाने लोग और भी कुछ जानना चाहते हैं। लेकिन पत्रकारों के पास कोई विकल्प नहीं है। उन्हें डटे रहना चाहिए। अन्यथा, बुरे लोग सांझ के धुंधलके में गुम हो जाएंगे और हम नए घोटालों का पीछा करने में लगे रहेंगे।
इस तरह की अनेक अधूरी गाथाएं हैं। एक बार इनको लेकर मीडिया में होने वाला शोर कम हो जाए, तो हम इन्हें परे रखते हुए आगे बढ़ जाते हैं। क्या इसका मतलब यह है कि जिन लोगों को हमने दोषी समझा, वे दोषी नहीं थे? या फिर बोफोर्स मामले की तरह इसका मतलब यह है कि चुप्पी के षड्यंत्र से मामला धीरे-धीरे अपने आप शांत हो जाता है? जनता की याददाश्त कमजोर होती है। यदि आप लंबे समय तक आवाजों को धीमा रखने में कामयाब रहते हैं तो धीरे-धीरे सबका ध्यान आपके केस से हट जाएगा। क्वात्रोच्चि आज आजाद घूम रहा है। हिंदुजा बंधु मजे से अपना बिजनेस चला रहे हैं, मानो कुछ हुआ ही नहीं। बॉब विल्सन गायब हो गया है। मार्टिन अर्दबो और विन चड्ढा की मौत हो चुकी है। और आखिर में हममें से किसी को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि कौन यह सारी रकम लेकर चंपत हो गया। हालांकि हमें इस बात का काफी हद तक आइडिया जरूर है कि इसका ज्यादातर हिस्सा कहां गया।
बोफोर्स कोई इकलौता ऐसा मामला नहीं है। मैं आपको ऐसे सैकड़ों मामले गिना सकता हूं। आपको अब्दुल करीम तेलगी याद है? एक समय था जब तेलगी के फर्जी स्टांप पत्र घोटाले की चारों ओर गूंज थी। इसे तकरीबन 35,000 करोड़ रुपए की लूट बताया जा रहा था, जिसमें कई राजनेताओं के जुड़े होने की बात कही गई थी। बाद के वर्षों में जैसे-जैसे इस केस की सुनवाई आगे बढ़ी, यह आंकड़ा भी घटता गया और हमें अंतिम रूप से जो आंकड़ा सुनने में आया, वह घटते हुए 100 करोड़ रुपए से भी नीचे आ चुका था। उसके बाद से इस मामले में पूरी तरह शांति छाई है, जबकि तेलगी जेल में सड़ रहा है।
इसी तरह केतन पारेख और कुख्यात शेयर घोटालों को याद करें। पारेख महीनों तक सलाखों के पीछे रहा। उसी दौरान गुपचुप और दिलचस्प ढंग से यह मामला धीरे-धीरे सुर्खियों से गायब हो गया। पारेख भी किसी अंधेरी खोह में जाकर गुम हो गया और दोबारा सामने नहीं आया। उसके बारे में कहा जाता है कि वह अभी भी बाजार में सक्रिय है। आखिर उन करोड़ों रुपयों का क्या हुआ, जो उसने छलपूर्वक बैंकों से उठाए थे? उन मुकदमों का क्या हुआ, जो उसके गुरु हर्षद मेहता के खिलाफ दायर किए गए थे? जब हर्षद मेहता ने नरसिंह राव को घूस देने की बात कबूल की, तो राजनीतिक प्रतिष्ठान पूरी ताकत से उसके खिलाफ जुट गया था। नतीजा क्या रहा? राव बेदाग बचकर निकल गए, जबकि हर्षद की रहस्यात्मक ढंग से जेल में मौत हो गई। उसके मुकदमे दशकों बाद आज भी घिसट रहे हैं। इसी तरह राजन पिल्लई के खिलाफ चल रहे मामलों का क्या हुआ? हर्षद मेहता की तरह उसकी भी हिरासत में मौत हो गई। पिछले साल उसके परिजनों को आखिरकार 16 वर्षों के बाद 10 लाख रुपए का मुआवजा मिला। सच्चाई पर अभी भी रहस्य का परदा पड़ा है।
कुछ समय पहले पुणे में घोड़ों का फार्म चलाने वाले हसन अली के नाम पर खूब हायतौबा मची थी, जिसके बारे में कहा जा रहा था कि उसने स्विस बैंक में अवैध रूप से 8 अरब डॉलर जमा कर रखे हैं। कई दिनों तक वह खूब सुर्खियों में रहा। यहां तक कि उसकी पत्नी भी सहभागी के तौर पर जेल पहुंच गई। उस पर आम्र्स डीलर अदनान खशोगी से सांठगांठ का भी आरोप था। देश की हरेक जांच एजेंसी हसन अली को अपने चंगुल में लेना चाहती थी। उसे भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और उसके बाद अचानक वह खबरों से पूरी तरह गायब हो गया।
इसी तरह हमारे घोटालों के पहले दागी दूरसंचार मंत्री सुखराम के साथ क्या हुआ, जिनके घर से नोटों से भरे बैग बरामद हुए थे? २जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में क्या हो रहा है? 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले का क्या हुआ, जिसमें लालू प्रसाद यादव का नाम सामने आया था? जैन की डायरियां कहां हैं? 1984 के सिख-विरोधी दंगों के आरोपी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के खिलाफ दर्ज मामलों का क्या हुआ? उत्तर प्रदेश में 10,000 करोड़ रुपए के ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले का क्या हुआ? 200,000 करोड़ के कर्नाटक वक्फ बोर्ड जमीन घोटाले का क्या हुआ? इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा घोटाले का क्या हुआ? और अब जबकि अजित पवार इस्तीफा दे चुके हैं, देखना यह है कि 72,000 करोड़ के सिंचाई घोटाले का क्या होता है?
सफल पत्रकारिता शोरशराबे पर नहीं, जिद और दृढ़ता पर टिकी होती है। यदि हमारे भीतर ऐसे मामलों के सुर्खियों से गायब होने के बाद भी उनके पीछे लगे रहने का धैर्य नहीं होगा, तो हम कभी इनके पीछे छिपी हकीकत को नहीं जान पाएंगे।
प्रीतीश नंदी
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार






