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बिना धन के स्वामी रामतीर्थ ने किया अमेरिका प्रवास

dainikbhaskar.com | Sep 12, 2012, 05:47AM IST
 
 

स्वामी रामतीर्थ जहाज से अमेरिका जा रहे थे। जब जहाज सेन फ्रांसिस्को बंदरगाह पर पहुंचा, तो स्वामीजी जहाज के डेक पर टहलने लगे। उनकी संन्यासियों वाली वेशभूषा से आकर्षित होकर एक अमेरिकी उनके पास आया और बोला -‘स्वामीजी! क्या आप यहां उतरेंगे? आपका सामान कहां है?’ स्वामीजी ने अपने थैले में रखी पुस्तकों व वस्त्रों की ओर संकेत करते हुए कहा - ‘मेरे साथ बस यही सामान है और मैं यहीं उतरूंगा।’





अमेरिकी चकित रह गया कि इतने से सामान से किसी का निर्वाह कैसे हो सकता है? उसने पूछा - ‘आप धन कहां रखते हैं?’ स्वामीजी ने उत्तर दिया - ‘मेरे पास रुपया-पैसा नहीं है, इसलिए मैं आपके जैसा धन नहीं रखता।’ अमेरिकी ने आश्चर्य से पूछा - ‘फिर आपका निर्वाह कैसे होता है?’ स्वामीजी हंसकर बोले - ‘मैं प्राणिमात्र से प्रेम करता हूं। मैं जब भूखा होता हूं, तो कोई रोटी खिला देता है और जब प्यासा होता हूं, तो कोई पानी पिला देता है।’ उस अमेरिकी का आश्चर्य और बढ़ गया।





ऐसा त्यागी पुरुष उसके लिए सर्वथा नई चीज था। उसने फिर प्रश्न किया - ‘अमेरिका में आपका कोई परिचित मित्र है?’ स्वामीजी ने मुस्कराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा और बोले - ‘हां, एक है।’ वह अमेरिकी स्वामीजी के स्नेहपूर्ण व्यवहार से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उन्हें अपना अतिथि बना लिया। यह अमेरिकी थे - डॉक्टर एल्बर्ट हिलर। वह आजीवन स्वामीजी के कृपापात्र बने रहे। सार यह है कि ‘वसुधव कुटुंबकम्’ का उदात्त भाव प्राणिमात्र के प्रति प्रेम व मित्रता के दिव्य भाव को जन्म देता है। इसे अपने व्यवहार का स्थायी अंग बनाना चाहिए।
 
 
 

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