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उपवासों के राजनीतिक संदेश

 
Source: श्रवण गर्ग   |   Last Updated 00:29(21/09/11)
 
 
 
 
नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए बहुचर्चित एवं बहुप्रचारित उपवास का राष्ट्र के नाम संदेश क्या रहा, इसका पता गुजरात सहित अन्य राज्यों में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही चल पाएगा और वह भी पूरी तरह नहीं।

नरेंद्र मोदी ने सद्भावना मिशन की शुरुआत का बीड़ा उस समय उठाया, जब गुजरात में लगभग हर मोर्चे पर सबसे ज्यादा शांति व सद्भाव कायम है। भारतीय जनता पार्टी इस बात पर गर्व कर सकती है कि कारण चाहे जो भी हों, उसकी झोली में पड़े राज्यों में कम से कम एक तो ऐसा है, जहां उसे मुख्यमंत्री बदलने अथवा मंत्रिमंडल की सूची को स्वीकृति देने या संसद के लिए उम्मीदवार तय करने में कभी कोई मेहनत नहीं करना पड़ी। इसे नरेंद्र मोदी की कार्यकुशलता भी माना जा सकता है या पार्टी आलाकमान पर मुख्यमंत्री का दबदबा भी।

पूछा जा सकता है कि सद्भावना मिशन अथवा अन्य किसी बहाने से नरेंद्र मोदी अगर देश की जनता से रू-ब-रू होकर अपनी असली ताकत दिखाने की इच्छा रखकर चल रहे थे तो उन्हें और कितनी प्रतीक्षा करनी चाहिए थी? वह कौन-सा उचित तरीका और समय हो सकता था, जब वे एक राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी ही पार्टी और एनडीए के समक्ष प्रस्तुत होते?

अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिली राहत के केवल दो दिन बाद ही अमेरिकी रिपोर्ट का मोदी के पक्ष में उजागर होना किसी भी समझदार मुख्यमंत्री के लिए उपवास और राजनीतिक कवरेज के लिए बेहतर अवसर माना जा सकता था।

राष्ट्रीय राजनीति की नब्ज टटोलने के अवसर को अगर मोदी ने पार्टी आलाकमान और संघ मुख्यालय की स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बगैर ही लपक लिया तो इसकी उनके राजनीतिक कौशल के रूप में तारीफ की जा सकती है।

वर्ष 2014 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच सीधा मुकाबला होता भी है या नहीं, यह अभी दूर की कौड़ी है। तब तक तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए विधानसभा चुनाव वाले राज्यों (खासकर उत्तर प्रदेश) की नदियों में काफी पानी बह चुका होगा।

भाजपा में प्रधानमंत्री पद के सशक्त उम्मीदवार के रूप में अपनी स्थायी पहचान बनाए रखने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा प्रारंभ होने के पहले ही नरेंद्र मोदी द्वारा अपने उपवास के मार्फत की गई ‘राष्ट्रनीति’ की घोषणा कई मायनों में महत्वपूर्ण है।

इस बात के अलावा कि नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी के सवाल ने एक सशक्त राजनीतिक विकल्प के रूप में एनडीए की संभावनाओं पर प्रश्नचिह्न् लगा दिया है, भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिए भी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

मसलन, गुजरात के मुख्यमंत्री का यह मानना कि सेकुलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) ने पिछले साठ सालों में देश को बांटने का ही काम किया है अथवा उनका यह कथन कि वे बहुमत-अल्पमत के विचार और वोट बैंक की राजनीति में यकीन नहीं करते, संघ और भाजपा के लिए वैचारिक स्तर पर कई चुनौतियां खड़ी कर देगा। वृहत हिंदू समाज का वह सेकुलर वर्ग, जो धीरे-धीरे यह मानने को तैयार हो रहा था कि भाजपा अपने कट्टर हिंदूवादी एजेंडे को डायल्यूट कर अपने घोषणापत्र को नए सिरे से लिखने का काम कर रही है, फिर सशंकित हो जाएगा।

इसी तरह अल्पसंख्यक समुदायों का धर्मनिरपेक्ष तबका फिर से कट्टरपंथी ताकतों की ओर रुख करने लगेगा। राजेंद्र सच्चर कमेटी के साथ बैठक में नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया यह जवाब गुजरात के संदर्भ में सही हो सकता है कि मुख्यमंत्री ‘अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कुछ नहीं करते, पर साथ ही बहुसंख्यकों के लिए भी नहीं करते’, पर यह देश की मौजूदा हकीकत से मेल नहीं खाता।

राष्ट्रीय एकता परिषद की हाल में हुई बैठक में सांप्रदायिक हिंसा विधेयकके मसौदे पर चर्चा के दौरान समूची बहस ‘बहुमत’ की ‘अल्पमत’ के खिलाफ हिंसा और उसके लिए सजा के प्रावधानों के औचित्य पर ही केंद्रित रही। बहस में भाग लेने वालों में भाजपा के प्रमुख नेता भी शामिल थे।

विकास की अवधारणा के सिद्धांत तय करने के मामले में बहुमत-अल्पमत के बीच फर्क को खत्म किया जा सकता है, पर नौकरियां उपलब्ध कराने, सामाजिक न्याय बांटने और सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों को सजा देने के मामले में वास्तविकताएं राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडों से विपरीत हैं। भाजपा का नेतृत्व नरेंद्र मोदी को अपनी अग्रिम पंक्ति का नेता मानने से तो निश्चित ही इनकार नहीं करता है, पर जिन मुद्दों को उन्होंने उठाया है, उन पर स्पष्टता का होना बाकी रहेगा।

बहस का एक मुद्दा यह भी बनता है कि नरेंद्र मोदी ने देश के प्रमुख विपक्षी दल (भाजपा) और विपक्षी गठबंधन (एनडीए) को लोकसभा चुनावों की तारीखों के काफी पहले ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बहस में व्यस्त कर दिया। कहा नहीं जा सकता कि भाजपा और संघ के अंदरूनी क्षेत्रों में ताजा बहस को लेकर क्या प्रतिक्रिया है, पर एनडीए के घटक दलों, विशेषकर जद-यू की ओर से जो कुछ कहा गया, वह ज्यादा चौंकाने वाला नहीं है। जनता जानती है कि भावी प्रधानमंत्री को लेकर यूपीए में चाहे भ्रम की कोई स्थिति हो, गैर-यूपीए दलों में तो इस शीर्ष पद के लिए कई उम्मीदवार इस समय मौजूद हैं।

इन मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने-अपने राज्यों में उपवास पर बैठना ही बस शेष है। चर्चा यहां चूंकि नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ किए गए मिशन की हो रही है, लिहाजा उनकी दृष्टि से देखा जाए तो अन्ना के आंदोलन से उत्पन्न हुए माहौल का लाभ लेने के लिए एक रामलीला मैदान अहमदाबाद में भी खड़ा करना जरूरी हो गया था। अपना उपवास तोड़ते हुए नरेंद्र मोदी ने कटाक्ष किया था कि देश को बड़े ‘सपने’ देखने की आदत नहीं है।

‘राष्ट्र की सेवा’ के अपने ‘सपने’ को कोई रूप देने सेपहले नरेंद्र मोदी के लिए जरूरी था कि भाजपा व एनडीए में अपने नेतृत्व की संभावनाओं को सद्भावना मिशन के जरिए ठीक तरह से टटोल लें। इतिहास गवाह है कि कोई एक चौथाई सदी तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके ज्योति बसु के समक्ष जब प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी का अवसर उत्पन्न हुआ तो उनकी ही पार्टी के कतिपय लोगों का विरोध आड़े आ गया था।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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