ममता बैनर्जी ने इंदिरा भवन का नाम बदल दिया तो बड़ा हंगामा मच गया। यह भवन कभी ज्योति बसु का आधिकारिक निवास हुआ करता था। ममता ने अब इसका नाम इंदिरा भवन के स्थान पर नजरुल भवन कर दिया है और वे यहां कवि नजरुल इस्लाम की स्मृति में एक संग्रहालय खोलना चाहती हैं।
मुझे लगता है यह एक अच्छा विचार है, क्योंकि आखिरकार नाम परिवर्तन की एक ऐसी कवायद हो रही है, जिसमें किसी तरह की कोई तुक है। नजरुल इस्लाम बेहतरीन कवि थे और उनकी स्मृति में संग्रहालय निर्मित करने के कारण लोगों का ध्यान उनके कृतित्व की ओर खिंच सकता है। वैसे भी देश में हजारों की संख्या में इंदिरा भवन पहले ही मौजूद हैं।
लेकिन भवनों, सड़कों और संस्थाओं के नामकरण और नाम परिवर्तन की राजनीति भारत में काफी समय से हो रही है। मुंबई को ही लें। आज इस शहर में ऐसी कई सड़कें और चौराहे हैं, जिनके नाम बदले जा चुके हैं। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं कि एक फीसदी से भी कम मुंबईवासी उन महान विभूतियों को जानते होंगे, जिनके नाम पर ९क् फीसदी सड़कों और चौराहों का नामकरण किया गया है। गनीमत है कि हममें से अधिकांश लोगों को इन स्थानों के वास्तविक नाम याद हैं, इसलिए हम अब भी अपना रास्ता तलाश सकते हैं। नहीं तो हम इस महानगर में बड़ी आसानी से गुम हो सकते हैं।
लेकिन यह कोई नहीं जानता कि आखिर नाम परिवर्तन क्यों किया जाता है। अगर सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करें तो यह सच उभरकर सामने आता है कि यदि आपके पास धनराशि है और यदि आपके किसी कॉपरेरेटर से अच्छे ताल्लुक हैं तो आप किसी भी सड़क या चौक का नामकरण अपने बाप-दादा के नाम पर करवा सकते हैं, फिर भले ही उन्होंने किसी अपराध में जेल की सजा ही क्यों न काटी हो।
हाल ही में खबर आई थी कि दिल्ली के मशहूर चांदनी चौक को अब तेंडुलकर चौक कहकर बुलाया जाएगा। सचिन तेंडुलकर के हालिया औसत प्रदर्शन के बावजूद मेरे मन में उनके प्रति कोई नकारात्मक विचार नहीं हैं, लेकिन हम अपने इतिहास की समृद्ध विरासत को क्यों खोएं? हम उन छवियों को क्यों खो दें, जो चांदनी चौक का यह नाम अपने में संजोए है? यदि ऐसा होता है तो यह इतिहास का पुनर्लेखन करने की हमारी मतिहीन प्रवृत्ति का एक और त्रासद पुष्टीकरण होगा।
यह ठीक वैसा ही होगा, जैसे मुंबई में उन सुंदर मूर्तियों को हटा दिया गया है, जिनकी वजह से काला घोड़ा नामक स्थान को यह नाम मिला था। ये मूर्तियां औपनिवेशिक शासन की यादगार नहीं थीं, वे उस महान कला का नमूना थीं, जो पहले हमारे चौराहों की सज्जा हुआ करती थी। अब हमने उनके स्थान पर नेताओं की मूर्तियां खड़ी कर दी हैं, जिनमें कोई कलात्मक सौंदर्य नहीं है।
किसी भी सड़क के नाम परिवर्तन का यही मकसद होना चाहिए कि हम उसे अधिक आसानी से खोज सकें, यह नहीं कि वह हमें यह बताए कि हमें किन व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिए। इतिहास की किताबें आमतौर पर ऐसा ही करती हैं। महात्मा गांधी रोड हमेशा एमजी रोड बन जाता है। स्वामी विवेकानंद रोड हमेशा एसवी रोड बन जाता है।
बहुत से लोग इन सड़कों का पूरा नाम भी नहीं जानते। इंटरनेट पर पूरी सूची उपलब्ध है कि आज ७५क्क् से अधिक सड़कें, संस्थान और शासकीय योजनाएं ऐसी हैं, जिनका नाम जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के नाम पर किया गया है।
लेकिन क्या वाकई हम इन विभूतियों को इन संस्थाओं और सड़कों के कारण ही याद रखते हैं? मायावती ने पूरे उत्तर प्रदेश में अपनी, कांशीराम और बाबासाहेब आंबेडकर की अनगिनत मूर्तियां लगवा दीं। लेकिन क्या इतने भर से ही उन्हें इतिहास में एक स्थायी मुकाम मिल जाएगा?
सभी सभ्य राष्ट्र अपने इतिहास को संजोकर रखते हैं, लेकिन उसका पुनर्लेखन करने का प्रयास क्यों किया जाए? वास्तव में हमें अपने इतिहास के साथ छेड़खानी करने के बजाय अपने लिए एक बेहतर भविष्य के निर्माण का प्रयास करना चाहिए। हम सभी के अपने-अपने नायक हैं। मैं फौज के किसी ऐसे जवान को याद रखना चाहूंगा, जिसने कारगिल में हमारी सरहदों की रक्षा करते हुए अपनी जान गंवा दी।
या मैं किसी ऐसे अनजाने फॉरेस्ट रेंजर की याद को संजोना चाहूंगा, जिसे कुछ लोगों ने इसीलिए गोली से उड़ा दिया था, क्योंकि उसने उन्हें वन्यजीवन को तबाह करने की इजाजत नहीं दी थी। या मैं किसी ऐसे सवर्ण ग्रामीण को याद करना चाहूंगा, जिसे इसलिए प्रताड़ित किया गया था, क्योंकि उसने गांव के किसी दलित परिवार के अधिकारों की बात की थी।
मेरे नायकों की सूची में वह युवा एमबीए शामिल होगा, जिसने विदेश में अपना कॅरियर बनाने के स्थान पर अपने देश लौटकर ग्रामीणों की सहायता की। या वे लोग मेरे नायक होंगे, जो किसी सांप्रदायिक दंगे या जातिगत संघर्ष में इंसानियत के पक्ष में उठ खड़े हुए हों और अपनी जान गंवा दी हो। हम सभी के अपने-अपने नायक होते हैं। सरकार हम पर अपने नायक नहीं थोप सकती। हमें किसी भी व्यक्ति को याद रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इतिहास का लेखन सरकारी फरमान पर नहीं किया जा सकता।
दिल्ली में कितने लोग जानते हैं कि जोसिप ब्रोज टीटो कौन थे? दिल्ली की सबसे बेहतरीन सड़कों में से एक का नामकरण उनके नाम पर क्यों किया जाना चाहिए, जबकि उनके स्वयं के लोग उन्हें भुला चुके हैं और वे जिस देश के सरपरस्त थे, उसका नामोनिशां भी नक्शे से मिट चुका है। कोलकाता या दुर्गापुर या कोन्नागर में किसी सड़क का नामकरण लेनिन के नाम पर क्यों किया जाना चाहिए, जबकि खुद उनका देश रूस ही उनकी साम्यवादी विरासत को खारिज कर चुका है? या फिर सार्वजनिक कार्यालयों में हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की तस्वीरें क्यों लगी होनी चाहिए?
आखिर हम एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं, गद्दाफी के लीबिया या माओ के चीन में नहीं। हमें ऐसे नायकों की जरूरत नहीं है, जिन्हें हम पर थोपा जाए। हम अपने नायकों का खुद चयन करने में सक्षम हैं। -लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।