यह तो उचित ही है कि पानी जैसे तेजी से घट रहे प्राकृतिक संसाधन के उपयोग के प्रति लोगों को जिम्मेदार बनाया जाए। इसके लिए समाज के सक्षम तबकों को जल के उपयोग के बदले तर्कपूर्ण दर पर भुगतान करना पड़े, इसमें भी कोई आपत्ति की बात नहीं है।
लेकिन समस्या तब आ सकती है, जब ऐसा करते हुए इस सामाजिक हकीकत को भुला दिया जाए कि जल एक बुनियादी आवश्यकता और अब संयुक्त राष्ट्र के एक संकल्प के तहत हर इंसान का बुनियादी हक भी है। इसलिए किसी भी जल नीति का पहला उद्देश्य सबको स्वच्छ जल की आपूर्ति करना होना चाहिए।
लेकिन केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जल नीति तैयार करने के लिए जो मसौदा विशेषज्ञों को उनकी राय जानने के लिए भेजा है, उससे लगता है कि यह लक्ष्य कम से कम उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है। उलटे संकेत यह मिलता है कि उसका प्राथमिक लक्ष्य उद्योग क्षेत्र को आसानी से पानी मुहैया कराना है।
प्रारूप में कृषि एवं घरेलू क्षेत्रों को पानी सप्लाई करने में हर तरह की सब्सिडी को खत्म करने की बात शामिल है, जबकि पानी के ट्रीटमेंट पर उसके पुनप्र्रयोग के लिए निजी उद्योगों को सब्सिडी एवं प्रोत्साहन देने की बात कही गई है। कुछ विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि मसौदे में भू-जल के संरक्षण पर पर्याप्त जोर नहीं है, जबकि यही पानी इस देश की जीवनरेखा है।
बहरहाल, एक सकारात्मक सुझाव इसमें यह शामिल है कि बड़ी जल परियोजनाओं के क्रम में विस्थापित होने वाले लोगों के लिए उतना ही लाभ सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जितना फायदा उससे लाभान्वित परिवारों को होता है। साथ ही विस्थापितों के पुनर्वास एवं मुआवजे की कीमत लाभान्वित परिवारों से जल की उचित कीमत के रूप में वसूल की जानी चाहिए।
बहरहाल, यह ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि पानी जैसे संसाधन पर कोई नीति तभी सार्थक एवं कारगर हो सकती है, जब उसमें सभी तबकों के हितों का ख्याल रखा जाए। इसलिए बेहतर होगा कि सरकार अपने प्रारूप पर सिर्फ विशेषज्ञों की ही राय न ले, बल्कि उसे सार्वजनिक दायरे में रखकर उस पर व्यापक राष्ट्रीय सहमति बनाए।