विज्ञापन
 
 
 
 

तिहाड़ के ये खास मेहमान

 
Source: प्रीतीश नंदी   |   Last Updated 00:24(10/11/11)
 
 
 
 
कई सालों से हमारे राजनेता नियम-कायदों को धता बताते आ रहे थे, फिर भले ही वे नियम कानून की किताबों में दर्ज हों या न हों। जहां एक तरफ वे ऐसे कानून बनाने में व्यस्त थे, जिनका पालन करना हमारे लिए अनिवार्य था, वहीं वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते थे कि ऐसे हर कानून में कम से कम इतनी पतली गलियां तो हों ही कि वे और उनके संगी-साथी आराम से उसमें से बचकर निकल जाएं।

वे कर चुकाने से कन्नी काटते रहे। वे जनता के हिस्से की जमीन हड़पते रहे। वे अवैध खनन करते रहे और पर्यावरण की सुरक्षा के नियमों को ताक पर रखते रहे। उन्होंने सरकारी खजाने को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जो जनता के पैसों से भरा था। उन्होंने घूसखोरी और लूटपाट की परिपाटी स्थापित की। लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि जब भी किसी व्यक्ति ने साहस और दृढ़ता दिखाकर विरोध की आवाज बुलंद की, उन्होंने उसे घेर लिया और उसकी चरित्र हत्या करने का प्रयास करने लगे।

यह लोकतंत्र का मजाक था। अखबारों के पहले पन्नों की सुर्खियों पर काबिज सशक्त राजनीतिक वर्ग और हम जैसे लोगों के बीच यह एक असमानतापूर्ण लड़ाई थी। और इस लड़ाई का सबसे ज्यादा खामियाजा भी हम जैसे लोगों ने ही भुगता है, उन्होंने नहीं।
लेकिन अब लगता है कि यह तस्वीर बदल रही है। जब दिग्गज राजनेताओं को तिहाड़ जेल भेजा गया तो देश की जनता ने इसका दिल खोलकर स्वागत किया। ऐसा लगा जैसे न्यायतंत्र ने भी राजनेताओं के आचरण से तंग आकर कहा हो कि ‘बस, बहुत हुआ।

अब यह सब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब कानून के उल्लंघन को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।’ इनमें से कुछ दिग्गज अब महीनों से सलाखों के पीछे हैं और फिलहाल तो इस बात के कोई संकेत नहीं नजर आ रहे कि उनकी पार्टी और उनके ताकतवर शुभचिंतक उन्हें बचा पाएंगे। सत्तातंत्र भी उन्हें जमानत पर रिहा करवाने में सफल नहीं हो पाया है।

अब अदालत केवल इसी आधार पर दोषियों को बख्शना नहीं चाहती कि सरकार उन्हें बचाना चाहती है। प्रधानमंत्री ने भी कानून का सम्मान करते हुए इन मामलों से खुद को लगभग अलग कर लिया है। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री भी अब इन परिस्थितियों से तंग आ चुके हैं और अब उन्होंने इस बात की फिक्र करना भी छोड़ दी है कि शायद उनका दफ्तर भी जांच-पड़ताल के दायरे में आ सकता है।

आज से कुछ साल पहले तक भला किसने कल्पना की होगी कि किसी दिन हमारे इन दिग्गज राजनेताओं का तिहाड़ जेल में रैनबसेरा होगा। इनमें से कई तो ऐसे हैं, जो कभी वातानुकूलित कमरों के बाहर नहीं सोए होंगे और जिन्होंने सूरज ढलने के बाद बेहतरीन शैम्पेन से कमतर किसी अन्य पेय पदार्थ से गला तर नहीं किया होगा। आज तिहाड़ में ए राजा जैसे पूर्व कैबिनेट मंत्री हैं।

डीएमके प्रमुख की प्रिय पुत्री कनिमोझी हैं। हमेशा चाक-चौबंद नजर आने वाले सुरेश कलमाडी हैं, जिन्होंने ‘पॉवर ब्रोकिंग’ के जरिये और अपने संगी-साथियों की मदद से राजनीतिक कॅरियर बनाया था। साथ ही कभी बड़े दंभ के साथ दिल्ली के किंगमेकर होने का दावा करने वाले बाहुबली अमर सिंह भी वहां हैं (हालांकि स्वास्थ्य कारणों से फिलहाल वह कुछ समय के लिए जेल से बाहर हैं)।

अफवाहों का दौर जारी है कि जल्द ही कुछ और लोग भी इन नेताओं का साथ देने के लिए जेल में आने वाले हैं, जिनमें एक कैबिनेट मंत्री और बिजनेस लीडर भी शामिल हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के सहायक रहे सुधींद्र कुलकर्णी के साथ ही संसद में नोटों की गड्डियां लहराने वाले वे अन्य भाजपा सांसद भी जेल में हैं, जिन्होंने उन्हें घूस दिए जाने का दावा किया था। भारतीय जनता पार्टी के एक पूर्व मुख्यमंत्री भी भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं।

क्या आज कोई भी इन लोगों के लिए अफसोस कर रहा है? क्या किसी के मन में उनके प्रति सहानुभूति की भावना है। कतई नहीं। और अगर घड़ियाली आंसुओं को नजरअंदाज कर दें तो शायद उनकी अपनी पार्टी के लोग भी उनकी फिक्र नहीं कर रहे होंगे। जो लोग प्रारंभ में उनके बचाव के लिए बहुत जोर-शोर से कवायद कर रहे थे, अब वे भी खामोश हो गए हैं।

क्लार्क गैबल के यादगार डायलॉग की तर्ज पर कहा जा सकता है कि ‘सच तो यही है कि उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है।’ प्रकृति के साथ ही राजनीति का भी यही सिद्धांत है कि उसमें खाली जगहें बहुत देर तक खाली नहीं रह पाती हैं। प्रकृति और राजनीति, दोनों ही निर्वात या शून्य को पसंद नहीं करते। इन लोगों को भी उनकी पार्टियों ने लगभग भुला दिया है और अब कोई अन्य व्यक्ति उनकी जगह लेने के लिए तैयार है।

देश के आम आदमी के लिए यह स्थिति एक मधुर प्रतिशोध की तरह है। हम एक पुरानी व्यवस्था को ध्वस्त होते देख रहे हैं। आज यह नहीं माना जा सकता कि दौलत, ताकत और रसूख के दम पर कानून के हाथों से बचा जा सकता है। न्याय में लोगों का भरोसा लौट रहा है। लोग अब फिर ‘देर है पर अंधेर नहीं’ की मिसाल में विश्वास करने लगे हैं।

यह कल्पना ही उन्हें रोमांचित कर देती है कि कनिमोझी और कलमाडी उसी जेल में रह रहे हैं, जहां चोरों और ठगों को रखा गया है और वे वही खाना खा रहे हैं। राजनेताओं के विशिष्टता बोध का अवसान हो रहा है। नेता अब कानून के ऊपर नहीं रह गए हैं। वे भी कानून के तहत ही हैं।

क्या यह मौजूदा परिदृश्य हमारी राजनीति में कुछ बुनियादी बदलाव लाने में सफल होगा? मुझे नहीं पता। लेकिन हां, इससे यह जरूर होगा कि आम आदमी की न्याय की खोज और सशक्त होगी। वह आशा और साहस के साथ न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रख पाएगा। जिस बदलाव का हमने हमेशा सपना देखा है, उसे हासिल करने का शायद यही पहला कदम है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आपके विचार

 
 
कोड :
2 + 2

 
 
विज्ञापन
 

बड़ी खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

रोचक खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बॉलीवुड

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जीवन मंत्र

 
 
 
 
 
 
 
 
 

क्रिकेट

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बिज़नेस

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जोक्स

 
 
 
 
 
 
 
 
 

पसंदीदा खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

फोटोगैलरी

Most Viewed

Victoria’s Secret picks sexiest women
Jennifer Flaunts Her Killer Curves
Just Added

The pocket piglets
 फैशन शो के दौरान मॉडल एलिशिया रावत।
 
 
 
विज्ञापन
 
 
| Email  Print Comment
| Email  Print Comment
(2)
Latest | Popular