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एक साहित्य मेले की सफलता

 
Source: चेतन भगत   |   Last Updated 00:11(26/01/12)
 
 
 
 
यह देखकर खुशी होती है कि भारत में कुछ ऐसी खूबसूरत चीजें भी हैं, जिनके बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण से लिखा जा सकता है। हाल ही में हुए जयपुर साहित्य समारोह (जेएलएफ) ने बड़े पैमाने पर लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया और भारत को दुनिया के नक्शे पर ला दिया। अभी जब मैं यह लिख रहा हूं, तब गूगल न्यूज पर जेएलएफ से संबंधित पांच हजार से भी अधिक स्टोरीज दुनियाभर में प्रदर्शित की जा रही हैं।


जेएलएफ ने जिस तेजी से अपने कदम बढ़ाए हैं, वह हतप्रभ कर देने वाला है। वर्ष 2008 में इस समारोह के प्रतिभागियों की संख्या 25000 थी, वहीं 2012 में यह बढ़कर 75 हजार तक पहुंच गई, यानी चार साल में तीस गुना। समारोह के दौरान आयोजन स्थल डिग्गी पैलेस खचाखच भरा रहा।

स्कूली विद्यार्थियों से लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता और विद्वानों से लेकर पर्यटक तक सभी इस समारोह के अनेक सत्रों में समान रूप से सहभागिता करते हैं। आयोजकों नमिता गोखले, विलियम डेलरिम्पल, संजॉय रॉय और शेउली सेठी की असीमित ऊर्जा इस आयोजन की धुरी है। उनके प्रयासों से ही यह आयोजन संभव हो सका, जिसके बारे में संजॉय ने कहा था कि यह सौ बेटियों को एक साथ ब्याहने की तरह है।

मजे की बात है कि जेएलएफ के कारण भारत को कॉमनवेल्थ खेलों की तुलना में कहीं बेहतर विश्वव्यापी पीआर मिली है। जेएलएफ का कुल बजट पांच करोड़ रुपए है, जिसे निजी प्रायोजकों के माध्यम से जुटाया गया था। वहीं कॉमनवेल्थ खेलों का बजट 70 हजार करोड़ रुपए था, जो लगभग पूरी तरह सरकारी खजाने से जुटाया गया था। लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों से संबंधित अधिकांश खबरें घोटालों या निर्माण कार्यो के घटियापन के बारे में थीं। यदि घोटाला नहीं होता तो इस पर किसी का ध्यान भी न जाता, क्योंकि यूरोप, जापान, सुदूर पूर्व के देश, अमेरिका आदि कॉमनवेल्थ में नहीं हैं।

ऐसे में यह अनुचित ही होगा कि हम जेएलएफ की सफलता से कोई सबक न सीखें और ऐसे ही अन्य इवेंट्स का आयोजन न कर दिखाएं।

जेएलएफ की कामयाबी के पांच कारण हैं। पहलाकारण है समारोह में दुनिया के प्रतिष्ठित लेखकों की सहभागिता। जेएलएफ में शामिल होने वाला हर लेखक भले ही बुकर या पुलित्जर पुरस्कार विजेता न हो, लेकिन उनमें से कुछ ऐसे जरूर थे। इसने इस समारोह को एक प्रतिष्ठा दी और इससे मीडिया भी आकर्षित हुआ।

यदि कोई समारोह विश्वस्तरीय नहीं है तो वह दुनियाभर के आकर्षण का केंद्र नहीं बन सकता। कॉमनवेल्थ खेल ओलिंपिक की तरह नहीं हैं और इसीलिए दुनिया उनकी ज्यादा परवाह नहीं करती। हमेशा सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयास करें, वरना दुनिया आप पर ध्यान नहीं देगी। दूसरा कारण यह है कि जेएलएफ के सत्रों को एक व्यापक श्रोता वर्ग की अभिरुचियों और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर तय किया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय मेहमान इस आयोजन से इसलिए जुड़ते हैं, क्योंकि वे पाते हैं कि इसमें शामिल होने वाले लेखकों में कम से कम एक तो ऐसा है, जिसे वे जानते हैं या जिसे उन्होंने पढ़ रखा है। लोकप्रिय फिक्शन के पाठकों के लिए भी इस समारोह में जगह है, ताकि वे खुद को अप्रासंगिक न अनुभव करें। यानी जेएलएफ में सभी के लिए कुछ न कुछ है। तीसरा कारण यह कि जयपुर बेहद खूबसूरत शहर है।

इस शहर का शिल्प अद्भुत है और उसका रखरखाव बहुत अच्छी तरह से किया गया है। (मैं भोपाल और भुबनेश्वर जैसी राजधानियों को भी इसी श्रेणी में रखता हूं)। राजस्थान सरकार टूरिस्ट फ्रेंडली है। राजस्थान के मिलनसार लोग अजनबियों का भी मुस्कराकर स्वागत करते हैं।

यह सुंदर परिवेश ही लोगों को बार-बार समारोह की ओर खींचता है। चौथा कारण यह है कि इसके आयोजकों का रवैया विनम्रतापूर्ण है। साहित्यिक वर्ग में एलीट प्रवृत्तियां होती हैं, लेकिन जेएलएफ ने स्वयं को दंभ और नकचढ़ेपन से दूर बनाए रखा है। सम्माननीय होने के लिए एलीट होना जरूरी नहीं है।

इसके लिए बस ‘कूल’ होना जरूरी है। पांचवां कारण यह है कि यह समारोह बड़े पैमाने पर मीडिया फ्रेंडली कंटेंट मुहैया कराता है। समारोह में लेखकों के पास कहने के लिए कुछ रोचक बातें होती हैं और अखबारों और टीवी चैनलों को उनसे बहुत रोचक खबरें मिल सकती हैं।

जाहिर है, कंटेंट के लिए हमेशा तत्पर रहने वाला मीडिया जेएलएफ में पूरे समय तैनात रहता है। और छठा कारण यह कि यह आयोजन लगभग पूरी तरह त्रुटिहीन होता है। इस साल समारोह के एक वक्ता के रूप में मैंने व्यवस्थाओं को पूरी तरह चाक-चौबंद पाया और लगभग सभी सत्र समय पर प्रारंभ हुए। भारत में इस तरह के सुप्रबंधित आयोजन दुर्लभ ही हैं।

लेकिन सभी सफल आयोजनों की तरह जेएलएफ को भी खुद को उन चीजों से परे रखने की जरूरत है, जो या तो उसकी प्रसिद्धि का बेजा फायदा उठाने की कोशिश करती हैं या महज ईष्र्या के कारण उसे नीचे गिरा देना चाहती हैं। उसे अपने विकास को भी प्रबंधित करने की जरूरत है, जो कि अभी पूरी तरह से बेरोकटोक मालूम हो रहा है। मैं दो सुझाव देना चाहूंगा।

पहली बात ये कि अतिरंजनापूर्ण स्वरों को एक सीमा के बाद ज्यादा महत्व न दें। लेखक अपनी बात कहना पसंद करते हैं, लेकिन जेएलएफ एक्टिविस्ट्स का आंदोलन नहीं है। सलमान रुश्दी विवाद के बारे में पहले ही बहुत कुछ कहा जा चुका है, लेकिन इससे एक सीधा-सा सबक यह लिया जाना चाहिए कि समारोह के एजेंडे को हाईजैक करने वाले लोगों से बचा जाए। इस समारोह को सभी दृष्टियों के प्रति निष्पक्ष बने रहना है। साथ ही उसे राज्य सरकार के दिशानिर्देशों का भी सम्मान करना चाहिए, जिसमें सुरक्षा संबंधी आग्रह भी शामिल हैं। हो सकता है कि कुछ सम्माननीय अतिथि सरकार की नीतियों से सहमत न हों, लेकिन विरोध प्रदर्शन के लिए यह उचित स्थान नहीं है।


दूसरी बात यह कि जिस तेजी से इस आयोजन की लोकप्रियता बढ़ रही है, उसे देखते हुए इसका सुनियोजन जरूरी है। मूल्य दरें थोड़ी कम करने से यह आयोजन अलोकतांत्रिक नहीं हो जाएगा। फ्री डेज-टिकट डेज, स्टूडेंट प्राइसिंग, डोनर इवेंट्स जैसे कई विकल्प हैं।

एक लेखक और भारतीय होने के नाते मुझे साहित्य के इस उत्सव के लिए गर्व का अनुभव होता है। जो लोग कहते हैं कि भारत का मतलब केवल बॉलीवुड और क्रिकेट है, उन्हें एक बार आकर यह समारोह देखना चाहिए। इस गणतंत्र दिवस पर हमारे सामने उत्सव मनाने के कई कारणों में से एक यह भी है कि जिस भारत को कभी ज्ञान की धरती माना जाता था, वहां आज भी संसार के श्रेष्ठ साहित्य समारोहों में से एक का आयोजन होता है। -लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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