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मंजिल नहीं बस चलते जाना है
रस्किन बॉन्ड
| Sep 01, 2012, 04:53AM IST

हममें से जिन्हें जीने के लिए काम करना पड़ता है और जो जरा-सा ज्यादा चल पाने की चाह रखते हैं, उन्हें आमतौर पर ऐसा मौका मिलता नहीं है। ऑफिस जाना होता है, समयसीमा में काम पूरे करने होते हैं, रेल या बसें पकड़नी होती हैं, सौदे तय करने होते हैं और लोगों से भी निपटना होता है।
तो फिर ये लोग कौन हैं, जिनके पास इस हिल स्टेशन पर सुबह से रात तक चलते रहने का वक्त होता है! मेरा अनुमान है कि कुछ लोग अपनी फिटनेस को लेकर जुनूनी होंगे, परंतु बहुत सारे तो दुखी आत्माएं ही हैं, जो मीलो-मील भटकते हुए थोड़ी राहत, थोड़ी सार्थकता ढूंढ़ लेते हैं। चलते वक्त वे कुछ भी नहीं देखते, चट्टान पर उग आया बैंगनी फूल भी नहीं।
मिस रमोला भी बरसों से यही कर रही हैं। इस सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका ने कभी शादी नहीं की। उनकी कोई सखी-सहेली भी नहीं है। नितांत अकेली। यहां तक कि कोई पुराना छात्र भी उनसे मिलने नहीं आता। वह बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं रही थीं। उनके पास बैंक में जमा पैसा है।
अपना फ्लैट भी है, पर वह इसमें ज्यादा समय नहीं बितातीं। मैं उनको अपनी खिड़की से लाल टिब्बा की ओर जाने वाली सड़क पर भटकते हुए देखता हूं। वह स्लैक्स और शर्ट पहनती हैं और किसी से भी बात करने नहीं रुकतीं।
लेफ्ट-राइट करते हुए सीधे पहाड़ की चोटी पर और वहां से नीचे फिर से घर। जब उन्हें देहरादून की ओर जाना होता है (पैदल चलने के लिए यह उनके लिहाज से भी ज्यादा दूरी है), तो वह कोई कार रोककर लिफ्ट मांगती हैं। उनके लिए न तो टैक्सियां हैं, न ही बस। मिस रमोला की सबसे बड़ी खुशी अपने धन पर कुंडली मारकर बैठे रहने में है।
उनके जैसे लोग और भी हैं। वे सारी दुनिया को शक की निगाह से देखते हैं। मानो हम सब उनकी दौलत और प्रॉपर्टी को उनसे जुदा कर देने के अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र में शामिल हैं। उनका न तो कोई नौकर है, न दोस्त। यहां तक कि रिश्तेदार भी एक सुरक्षित दूरी पर ही रखे जाते हैं।
इसी तरह का या कहना चाहिए कि ज्यादा झक्की किरदार है मिस्टर सेन, जो अमेरिका में रह चुके हैं और यहां पांच मील सैर पर जाते और फिर वापस आते हैं- हर दिन, हर मौसम में, साल-दर-साल। हफ्ते में एक-दो बार कम्युनिटी हॉस्पिटल में रुककर ब्लडप्रेशर चेक कराते हैं या फिर खून या मूत्र का परीक्षण कराते हैं।
वह जिस तरह पैदल चलते हैं, उसके हिसाब से उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, लेकिन बीमारियों के वहम के चलते उन्हें लगता है कि वह इस या उस कारण से मौत की ओर बढ़ रहे हैं। वह एक बार मेरे पास आए थे।
मिस रमोला के उलट ऐसा लगा कि मिस्टर सेन दोस्ती करना चाहते हैं, पर उनकी सनकी प्रकृति के कारण लोग दूर छिटक जाते हैं। उन्हें लगता था कि वह दुश्मनों से घिरे हैं। उन्होंने मुझे बताया कि लोग हमेशा उन्हें घूरते रहते हैं। मुझे हैरानी हुई, क्योंकि वह पूरी तरह सामान्य नजर आते हैं।
वह शहरी इलाकों में पूरी तरह स्वीकार्य पश्चिमी परिधान पहनते हैं और अच्छे-भले लगते हैं। हां, सिर को कभी दाहिने मोड़ते हैं, कभी बाएं, कभी आगे देखते हैं, कभी पीछे। घबराए हुए-से यह देखते रहते हैं कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा। उनके मन में यह बात बैठ चुकी है कि पूरे समय उनका पीछा किया जाता है।
मैंने पूछा, ‘आखिर आपके पीछे कौन है?’ वह बोले, ‘सरकार के एजेंट।’ ‘पर क्यों?’ उन्होंने जवाब दिया, ‘मैं अलग दिखता हूं। वे मुझे बाहरी आदमी समझते हैं। उनका ख्याल है कि मैं सीआईए के लिए काम करता हूं।’
मैंने पूछा, ‘क्या वाकई आप करते हैं?’ वह चौंककर पीछे हटते हुए बोले, ‘नहीं-नहीं! आपने ऐसा क्यों कहा?’ मैंने जवाब दिया, ‘सिर्फ इसलिए, क्योंकि आप ने ही यह विषय निकाला, वरना मैंने तो कभी किसी को आपका पीछा करते नहीं देखा।’ उन्होंने कहा, ‘शायद वे इस मामले में बहुत चतुराई से काम करते हैं। हो सकता है आप भी मेरे पीछे हों।’
‘लेकिन मैं तो आपकी तरह तेजी से नहीं चल सकता।’ मैंने एक ठहाके के साथ कहा, लेकिन उन्हें हंसी नहीं आई। मैंने कहा, ‘मैं गायब होना जानता हूं। आप जान ही नहीं पाएंगे कि मैं आसपास ही हूं। इसीलिए कोई भी मेरा पीछा नहीं करता। मेरे पास जादुई लबादा है, जिसे पहनकर मैं गायब हो जाता हूं।’
उन्होंने बेकरारी से पूछा, ‘क्या मुझे उधार दे सकते हैं?’ मैंने कहा, ‘मैं जरूर दे देता, लेकिन अभी तो वह धुलने गया है। हो सकता है अगले हफ्ते तक आ जाए।’ वह भुनभुनाए, ‘झक्की..पूरा पागल है।’ और हड़बड़ी में निकल गए।
..और यहां सुनाने के लिए काल्पनिक कथाओं से भी ज्यादा विचित्र एक घटना है। कर्नल पुरुषोत्तम बस रिटायर ही हुए थे और उन्होंने तय कर लिया था कि जीवन की संध्या में अब वही काम करने हैं, जिनमें उन्हें सबसे ज्यादा मजा आता है।
भोर और ढलती शाम में घूमना, दुपहरी में आराम, रात के भोजन से पहले चुस्कियां और पलंग की बगल में मेज पर रखी बढ़िया किताब। उनके घर से कुछ सड़क छोड़कर एक इमारत के चौथे माले पर रहती थीं मिसेज एल। 40 पार की एक धाकड़ महिला। अनदेखी की शिकार। जीवन से तंग आ चुकी थीं और खुद से ही दूर भाग जाना चाहती थीं।
तो एक दिन की बात है। नीचे की सड़क पर कर्नल चहलकदमी कर रहे थे। हवा में मस्ती थी, उनके होंठों पर गीत था। दिल में जीवन के प्रति प्यार भरा था और वह उससे कुछ ज्यादा चाहते थे। इसी क्षण मिसेज एल ने चौथे माले के अपने फ्लैट की खिड़की से छलांग लगा दी। कुछ पल बाद वह भद्द से कर्नल पर आ गिरीं।
यदि यह कोई रोमांटिक कहानी होती, तो यहां पर पहली नजर का प्यार हो गया होता। लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि उनसे दबकर कर्नल की हड्डी-पसली एक हो गई और वह इसके असर से उबर नहीं पाए। दूसरी तरफ मिसेज एल कूदकर भी बच गईं और उन्होंने तकलीफदेह बुढ़ापा काटा।
यहां कहानी का कोई सबक नहीं है, लेकिन सबसे बड़ी बात, जीवन का बड़ा सबक है : कोई नहीं जान सकता कि कब आसमान से कुछ टपक जाए और बहुत बढ़िया ढंग से बनाई गई किसी की शानदार योजना पर पूर्णविराम ही लगा दे।






