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सड़कों पर टहलतीं बर्बाद जिंदगियां

 
Source: खुशवंत सिंह   |   Last Updated 00:08(07/01/12)
 
 
 
 
मैंने हमारे मौजूदा समय के लिए एक स्लोगन गढ़ा है : ‘सेक्स वर्कर्स का उदय।’ एक ऐसा समय, जिसमें इस तरह की स्त्रियों के पास खोने को कुछ भी नहीं है, सिवाय अपनी शर्म के। यह बड़ी अजीब बात है कि पुरुष चिरकाल से उनका शोषण करते आ रहे हैं और इसके बावजूद वे उन्हें अपमानजनक नामों से पुकारते हैं।

वे उनसे अमानवीय व्यवहार करते हैं और सोचते हैं कि उन्हें महज सेक्स वर्कर का तमगा देने से उनके प्रति उनके अपराध कम हो जाएंगे। उनका संबोधन बदल देना ही काफी नहीं है, उन्हें समाज में एक सम्माननीय स्थान देना भी जरूरी है। क्योंकि अगर ये महिलाएं खुद को इस गर्त में झोंकने को राजी न हों, तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि समाज में दुराचार और व्यभिचार की वृत्तियां बहुत बढ़ सकती हैं।

भारत के हर बड़े शहर में एक न एक इलाका ऐसा है, जिसे ‘रेड लाइट एरिया’ कहा जाता है। कोलकाता में सोनागाछी है, मुंबई में कमाठीपुरा है, दिल्ली में लाहौरी गेट है। सबसे पहले तो इन तथाकथित लाल बत्ती इलाकों को ही समाप्त किया जाना चाहिए। पश्चिम में आमतौर पर देह व्यापार के ऐसे सघन क्षेत्र नहीं होते।

वहां देह व्यापार करने वाले स्त्रियां स्ट्रीट वॉकर के रूप में पाई जाती हैं और पुरुष ग्राहक उनके संपर्क में रहते हैं। बहरहाल, ‘प्राइवेट आई’ पत्रिका के ताजे अंक में ‘द न्यूयॉर्क डेली न्यूज’ के एक वृत्तांत का उल्लेख किया गया है, जो इन स्ट्रीट वॉकर महिलाओं के जीवन में परिवर्तन लाने के प्रयासों के बारे में है। वह वृत्तांत कुछ इस तरह है :

‘‘प्रोस्टिट्यूशन मीटर्स स्थापित करना हमारे कर राजस्व को बढ़ाने का एक हिस्सा है,’ सिटी काउंसिल की इसाबेल क्लॉट्ज ने बॉन में हमारे रिपोर्टर से बात करते हुए कहा, ‘और हम यह अपेक्षा करते हैं कि अपने इस कदम से हम हर साल लगभग दो लाख यूरो का अतिरिक्त राजस्व अर्जित कर सकेंगे। चकलाघरों और क्लबों में काम करने वाली महिलाएं वर्षो से कर चुका रही हैं, लेकिन स्ट्रीट वॉकर्स से कर प्राप्त करना हमेशा से ही कठिन रहा है।

अब उन्हें हर रात को हमारे किसी एक मीटर से छह यूरो का टिकट अनिवार्य रूप से लेना होगा। हमारी टीम द्वारा यदा-कदा उनके क्षेत्र का निरीक्षण भी किया जाएगा और जो महिला बिना टिकट के पाई गई, उसे सजा के रूप में जुर्माना भरना होगा। इस प्रणाली की मदद से हम अब सभी नागरिकों की तरह इन स्ट्रीट वॉकर महिलाओं से भी कर प्राप्त कर सकेंगे।’

‘लेकिन सामान्य पार्किग मीटर्स की तरह लगने वाले ये मीटर्स स्ट्रीट वॉकर्स को बहुत रास नहीं आए हैं। डोना कार्मेन प्रोस्टिट्यूट सपोर्ट ग्रुप की रोजिना हेरिंग कहती हैं : ‘यह सरकार द्वारा हम पर शिकंजा कसने की एक और कोशिश है। हमें पहले ही महज एक स्ट्रीट तक सीमित कर दिया गया है। जहां तक कर का सवाल है तो प्रोस्टिट्यूट्स पहले ही आयकर का भुगतान कर रही हैं और इन मीटर्स का वित्तीय संतुलन से कोई सरोकार नहीं है। ये शोषण के उपकरण हैं और हम मांग करती हैं कि इन्हें जल्द से जल्द हटा दिया जाए।’’

बहरहाल, यह तो तय है कि देह व्यापार जैसी बुराइयों को सकारात्मक रूप से ही समाप्त किया जा सकता है। स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क जैसे स्कैंडिनेवियाई देश इसका एक अच्छा उदाहरण हैं, जहां देह व्यापार समाप्त होने की कगार पर है, क्योंकि इन देशों की महिलाएं अपनी यौन आकांक्षाओं को लेकर कहीं सजग रवैया रखती हैं।

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दूरदराज तक बसे सिख : चंद्रमा के धरातल पर मनुष्य की पहली लैंडिंग का सिख संस्करण कुछ यूं है : ‘जब अमेरिकी एस्ट्रॉनॉट नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा पर कदम रखे तो एक सिख परिवार ने वहां उनका स्वागत किया। आर्मस्ट्रांग ने हैरत से पूछा : आप लोग यहां क्या कर रहे हैं?

सरदार ने जवाब दिया : हम अपने मुल्क के बंटवारे के बाद यहां रहने चले आए थे।’ यह एक छोटी-सी कहानी है, लेकिन स्वर्ण सिंह मनोहर की हाल ही में प्रकाशित किताब ‘सिख इन लैटिन अमेरिका : ट्रैवल्स अमंग द सिख डायस्पोरा’ की इससे बेहतर प्रस्तावना कोई और नहीं हो सकती थी।

लेखक ने दक्षिण अमेरिका के दूरदराज के इलाकों तक यात्राएं करते हुए वहां बसे सिख परिवारों की प्रामाणिक जानकारियां जुटाई हैं। दक्षिण अमेरिका में सिखों की सबसे बड़ी बसाहट मैक्सिको के यूबा शहर में है, जहां दीदार सिंह अपने परिवार सहित रहते हैं। अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों में भी सिखों की छोटी-मोटी बस्तियां हैं।

प्रवास की प्रक्रिया कुछ इस तरह है : एक सिख परिवार किसी क्षेत्र में पहुंचता है, जमीन खरीदता है और अच्छा पैसा कमाने लगता है। फिर वह अपने गांव से कुछ लोगों को भी वहां बुला लेता है। जल्द ही वहां सिखों की एक बस्ती बन जाती है। वे एक गुरुद्वारे का निर्माण करवाते हैं। वे धर्मशाला भी बनवाते हैं, जहां नवागतों को ठहराया जाता है। और जाहिर है, गुरु के लंगर का आयोजन भी नियमित रूप से किया जाता है।

स्वर्ण सिंह मनोहर ने जबर्दस्त शोध किया है और दुनिया के ऐसे क्षेत्रों में विकसित हो रही सिख संस्कृति का पता लगाया है, जिसके बारे में अभी तक ज्यादा जानकारी नहीं थी। उनकी किताब को हर अच्छी लाइब्रेरी में जगह मिलनी चाहिए। यह हर उस व्यक्ति के पास भी होनी चाहिए, जिसकी इस विषय में रुचि है।
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बेहतरीन अनुवाद : बूटा सिंह अंग्रेजी में महारत हासिल करना चाहता था। इसके लिए उसने स्पेशल क्लासेस अटेंड की। कुछ लेक्चरों के बाद टीचर ने उसे इस वाक्य का अंग्रेजी में अनुवाद करने को कहा : ‘दुख हमेशा साथ रहता है, मगर खुशी आती-जाती रहती है।’ बूटा सिंह ने इसका अनुवाद किया : ‘माय वाइफ इज आलवेज विद मी, बट हर सिस्टर कम्स एंड गोज।’ (सौजन्य : आरएस माथुर, दिल्ली) -लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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