जीने की राह..
आजकल व्यावसायिक जीवन में सफल लोगों के बीच इस बात की लगातार बहस छिड़ी होती है कि सफल होना हो तो समय देना पड़ेगा और किस-किस का समय चुराकर अपनी सफलता को तैयार किया जाए। यह सवाल जब अध्यात्म के सामने खड़ा किया गया तो अध्यात्म कहता है कि सवाल सफल होने का नहीं है, होश में सफल होने का है।
अत्यधिक काम की अपनी मदहोशी होती है और सफलता का अपना नशा है। दोनों ही समय आदमी अपने होश से बाहर चला जाता है। संसार को आपके पद से लेना-देना है और अध्यात्म का आपके होश से संबंध है। अवेयरनेस यदि पूरी तरह है तो किसी भी तरह की सफलता और असफलता परेशान नहीं करेगी। यह होश किस बात का नाम है। सीधी-सी बात है अपने बारे में जानकारी होना, अपने क्रियाकलाप के प्रति सजग रहना और इस शरीर के भीतर ऐसा कुछ है, जिसको चेतना कहते हैं उससे जुड़ने का नाम होश है। जिस तरह इत्र में सुगंध, अगरबत्ती के धुएं मंे खुशबू और चंदन में महक होती है, उसी प्रकार आप फूलों के राजा गुलाब को देखिए, किसी भी स्थिति में उसकी महक और खूबसूरती अलग ही अंदाज मंे होती है।
शायद इसीलिए उसको फूलांे का राजा कहा गया है। उसमें गुलाबीपन होता है। अलग-अलग रंग के गुलाब हों तो भी आप गुलाबीपन पकड़ सकते हैं। इसी तरह आदमी में होश जाग जाए तो वो किसी भी पद पर हो, किसी भी क्षेत्र में हो, कोई-सा भी काम कर रहा हो, एक अलग अंदाज में, अलग सुगंध के साथ करेगा। लोगों को महसूस होगा कि इसमंे कुछ बात है और वही बात हमें भीतर से शांत और बाहर से सफल रखेगी।