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चुनावों में अनिश्चितता ही निश्चित है

 
Source: एम.जे. अकबर   |   Last Updated 00:47(02/10/11)
 
 
 
 
सत्ता की ओखली में कांग्रेस महत्वाकांक्षा के मूसल की मार सह रही है। भाजपा सत्ता की प्रत्याशा में भयंकर सिरदर्द से पीड़ित है। पहली चीज गंभीर है। दूसरी बचकाना है। भारतीय राजनीति विभिन्न पदों का दीर्घकालीन अनुभव रखने वाले पी. चिदंबरम और नरेंद्र मोदी सरीखे नेता की असाधारण दृष्टि से भौंचक है, जो अधीरता नामक भेदभाव न करने वाली बीमारी में फंसी है, जिसका चिड़चिड़ापन नामक एक सहायक साइड इफेक्ट भी है।

पी. चिदंबरम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में याददाश्त के सुविचारित ह्रास से ग्रस्त हो गए, जबकि नरेंद्र मोदी भाजपा की राष्ट्रीय समिति की बैठक की तारीख याद नहीं रख पाए। कांग्रेस का रोग गंभीर है, क्योंकि केंद्र की सरकार दुष्क्रियाशील हो चुकी है। जहां तक भाजपा की बात है, कोई इसके अति आकांक्षी नेताओं को बताए कि मतदाता के वोट देने से पहले ही जो चुनाव में अपनी जीत तय मानने लगते हैं, भारतीय मतदाता में उन्हें दंडित करने की प्रवृत्ति होती है।

कांग्रेस हतोत्साहित तो है, पर निश्चित तौर पर खुद को अगले आम चुनावों की संभावनाओं से बाहर नहीं गिनती है। इसकी रणनीति पांच कदमों पर बुनी गई है, जो उम्मीद के तर्क से जुड़े हैं। प्रस्थान बिंदु मतदाता की स्मृति की उदारता है। कांग्रेस भरोसा करती है कि यह याददाश्त छोटी होगी। दूसरा, लोकपाल बिल के रास्ते जनरोष शांत पड़ जाएगा। इसके कुछ रणनीतिकार तो उस आदमी की तरफ से अनुमोदन के सपने भी देख रहे हैं, जिसका पहले उन्होंने अपमान किया और फिर जेल भेज दिया: अन्ना हजारे।

तीसरा: कांग्रेस स्वयं को समझा चुकी है कि भ्रष्टाचार सार मुद्दा नहीं, महज सतह की फुंसी है, जिसे जरा से सुधारक मलहम की मालिश से दूर किया जा सकता है। चौथा: पार्टी यकीन करती है कि वर्तमान विपदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रतिष्ठा पर फेंकी जा सकती है, जो व्यक्तिगत अभियोज्यता नहीं, बल्कि राजनीतिक कुप्रबंधन के कारण रवाना होंगे।

पांचवां कदम उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव की कामयाबी के बाद मध्यावधि चुनाव की प्रक्रिया आरंभ कर सकता है। पार्टी मानती है कि पिछले चुनावों का क्रांतिकारी बदलाव कृषि कर्जो की माफी के साथ आया था, हालांकि अनिवार्य नहीं है कि तथ्य भी इसी निष्कर्ष की पुष्टि करते हों: ये तो शहरी वोट थे, जो हिसाब को 200 से परे ले गए। फिर भी, यह समझ है और समझ मायने रखती है।

कुंजी है उत्तरप्रदेश चुनावों से आशा के अनुरूप मिला उछाल, जिसके बारे में कांग्रेस का भरोसा है कि वह राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली होगा। इस कुंजी की कुंजी है उम्मीदों का प्रबंधन। वास्तव में, कांग्रेस आम चुनावों में यूपी के प्रदर्शन को दुहराने संबंधी किसी भी उम्मीद को त्याग चुकी है, जब उसने मोटे तौर पर 120 विधानसभा सीटों के बराबर जीत हासिल की थी। 2012 में वह 60 विधानसभा सीटों का क्षेत्र हासिल कर लेने पर ही विजयोल्लास के लिए तैयार है।

उसे उम्मीद है कि वह मायावती पर हमले केंद्रित कर उससे ये छीन लेगी। वह मुलायम सिंह यादव पर इतनी कठोर नहीं होगी, क्योंकि उसे चुनाव बाद गठबंधन की जरूरत है। बहरहाल, यह इतनी हड़बड़ी में भी नहीं होने जा रहा। यदि विभागों के मामले में मायावती बेहतर सौदे की पेशकश करती हैं, तो कांग्रेस मायावती से गठबंधन करेगी।

कांग्रेस को विश्वास है कि ये जादुई 60 सीटें लखनऊ में सत्ता का द्वार खोलेंगी, क्योंकि कोई पार्टी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी और फिर वह इस ताकत का इस्तेमाल राहुल गांधी के चुनाव-2014 की तैयारी में मतदाताओं को लुभाने के लिए कर सकती है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अगले साल उप्र विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान में सितारे होंगे। बाद वाली समूचे प्रदेश में सक्रिय होंगी। प्रियंका अगले आम चुनाव में अपनी मां सोनिया की रायबरेली सीट से चुनाव लड़ेंगी।

यह इस किस्म का अनुमान है, जो कांग्रेस के नेताओं के लिए चैन की नींद सुनिश्चित करता है और उन्हें अन्ना हजारे रूपी दु:स्वप्न को स्थायी वास्तविकता की बजाय क्षणिक घटना के तौर पर खारिज कर देने के लिए फुसलाता है। भाजपा के यथार्थवादी भी इस बात के कायल कर लिए गए हैं कि उनकी वर्तमान ऊध्र्वगति की रफ्तार उत्तरप्रदेश में उनके प्रदर्शन पर निर्भर करेगी। उनका न्यूनतम लक्ष्य 80 सीटें हैं। भाजपा और कांग्रेस, दोनों बहुत अच्छा नहीं कर सकतीं।

राजनीतिज्ञों नहीं, राजनीतिक प्रेक्षकों के बीच हालिया अनुमान है कि मुलायम, मायावती और छोटी पार्टियां 300 से ज्यादा सीटें जीत जाएंगी और भाजपा व कांग्रेस के लिए सौ के आसपास सीटें रह जाएंगी। इन दोनों में से कोई एक ही सम्मानजनक 60 या शानदार 80 तक पहुंच सकती है।

अगर जमीन के ज्यादा करीब रहने वाले राजनेता कभी नहीं जान पाते कि चुनाव में क्या होने वाला है, तो स्तंभकार तो और भी कम जानते हैं। जब नतीजे आते हैं, तो हो सकता है कि इन आंकड़ों और अनुमानों का तथ्यों से उतना ही मेल हो, जितना कि सत्य से गप का होता है।

प्रासंगिक यह है कि यह अनुमान है, जो कांग्रेस को अगले दो वर्षो के लिए उसकी योजनाओं की ओर ले जा रहा है। यह अगर सबकुछ सही होता है, तो भी पार्टी के लिए मुश्किल होने जा रहा है, और अगर चीजें उल्टा-पुल्टा हो गईं, तो विनाशकारी होने जा रहा है।

उप्र के चुनावों और दिल्ली पर उसके असर के बारे में केवल एक ही चीज निश्चित है कि कोई भी निश्चित नहीं है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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