अंकल केन और पहाड़ी झरना
रस्किन बॉन्ड
| Aug 07, 2012, 06:24AM IST

एक सुबह अंकल केन ने बताया कि वे छह अमेरिकी पर्यटकों को गरम पानी का झरना दिखाने ले जा रहे हैं। वह बहुत खुश थे, क्योंकि उन्हें उनसे अच्छी कमाई की उम्मीद थी। उनके इस प्रोग्राम के बारे में जानकर मेरी नानी ने रास्ते में खाने के लिए एक डिब्बे में कुछ सैंडविच और घर में बने बिस्किटों के साथ-साथ दर्जन भर संतरे भी पैक कर दिए। उन्हें लगा कि इतनी सामग्री अंकल केन के लिए दिनभर के लिए पर्याप्त होगी। वैसे भी गरम पानी का झरना महज दस किलोमीटर दूर था और अंकल केन को वहां से शाम तक लौट आना चाहिए था।
लेकिन हमें तीन दिन के बाद उनके दर्शन हुए। जब वह लौटे तो उनकी स्थिति देखने लायक थी। उनके कपड़े धूल से सने थे व जगह-जगह फट भी गए थे। गाल पिचक गए थे और उनकी गंजी खोपड़ी धूप में झुलसकर लाल हो गई थी। उनकी यह हालत देखकर हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। हमने उनसे उनकी इस हालत के बारे में जानना चाहा, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे चलते हुए बरामदे में पहुंचे और आरामकुर्सी पर निढाल होकर गिर गए। इसके बाद वह मेरी नानी से बोले, ‘बहुत जोरों की भूख लग रही है आंटी!
कुछ खाने को मिल जाएगा?’ नानी ने उनसे पूछा, ‘तुम जो अपने साथ खाना लेकर गए थे, उसका क्या हुआ?’ इस पर अंकल ने बुझे मन से जवाब दिया, ‘हम सात लोग थे आंटी और जो खाना आपने दिया था, वह तो पहले दिन ही खत्म हो गया।’ यह सुनकर नानी बोलीं, ‘खैर, वैसे भी वह खाना एक दिन के लिए ही था। लेकिन तुमने तो कहा था कि तुम उन्हें गरम पानी के झरने तक ले जा रहे हो, फिर लौटने में इतना वक्त कैसे लग गया?’ अंकल केन बोले, ‘हां हम जा तो वहीं रहे थे, लेकिन वहां तक पहुंच ही नहीं पाए। हम पहाड़ियों के बीच रास्ता भटक गए।’ यह सुनकर हमें हंसी आ गई, लेकिन उनकी हालत देखकर हमने किसी तरह इसे काबू में कर लिया।
थोड़ी देर बाद नानी ने उनसे कहा, ‘तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती केन। आखिर अब तुम एक गाइड हो। तुम्हें यहां के रास्तों के बारे में सारी मालूमात होनी चाहिए। आखिर तुम नदी के किनारे-किनारे बढ़ते हुए भी तो झरने तक पहुंच सकते थे?’ यह सुनकर अंकल केन ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, ‘वही तो किया था आंटी, इसके बावजूद मैं रास्ता भटक गया। दरअसल मैं उन्हें घाटी में गलत नदी के रास्ते ले गया। रास्तेभर मैं यही सोचता जा रहा था कि नदी के अगले मोड़ पर झरना होगा, लेकिन वह मोड़ कभी आया ही नहीं। हम लगातार चलते हुए पहाड़ी की चोटी तक पहुंच गए और तब जाकर हमें अपने रास्ता भटकने का अहसास हुआ। तब तक शाम गहराने लगी थी और हमारे पास वहीं रुकने के अलावा कोई चारा नहीं था। हमने वहां खुले आसमान के नीचे कड़कड़ाती ठंड में किसी तरह रात बिताई। अगले दिन हमने सोचा कि हम मसूरी के रास्ते जल्दी वापस पहुंच जाएं, लेकिन एक बार फिर हमारी किस्मत हमें दगा दे गई। हमने फिर गलत रास्ता चुन लिया और मसूरी की जगह केम्प्टी पहुंच गए। वहां से किसी तरह हम नीचे सड़क तक पहुंचे और बस पकड़कर वापस आ गए।’
अंकल केन की हालत वाकई बहुत खराब लग रही थी। मैंने व नानी ने मिलकर किसी तरह उन्हें उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। थोड़ी देर बाद नानी उनके लिए सब्जियों का गरमागरम सूप बनाकर ले आईं, जिसे पीकर उन्हें काफी राहत मिली। वह दो दिनों तक बिस्तर पर रहे और इस दौरान हमने उनका पूरा ख्याल रखा। हालांकि स्वस्थ होने के बाद उन्होंने एक बार भी इसके लिए आभार व्यक्त नहीं किया। हमें इसका कोई मलाल भी नहीं था। आखिर दुनिया में कुछ अंकल ऐसे भी होते हैं, जो कभी ‘बड़े’ नहीं होते।
जहां तक मेरी नानी का सवाल है तो वह बेहद सहृदयी और दूसरों का ख्याल रखने वाली महिला थीं। मेरे पेटू स्वभाव को देखते हुए वह मुझसे अक्सर कहती थीं, ‘अच्छा खाओ, लेकिन बहुत ज्यादा कभी नहीं। अति हर चीज की बुरी होती है।’ वह खाने-पीने की चीजों को भगवान का दिया अनमोल उपहार मानती थीं और इसका दुरुपयोग होते नहीं देख सकती थीं। उन्हें भोजन संबंधी अनेक कहावतें मुंह जुबानी याद थीं। वह अक्सर हमसे कहती थीं कि कम खाना ही लंबी सेहत का राज है और हम जो भी पकाएं, उसे पूरे मन से पकाना चाहिए। आखिर भोजन पकाना भी एक कला है। वह सुबह के नाश्ते पर खास जोर देती थीं और उनका कहना था कि यदि हमने सुबह ढंग से नाश्ता नहीं किया तो हमारा पूरा दिन खराब हो सकता है। उन्होंने इस तरह की कहावतों की एक सूची बनाकर किचन के दरवाजे पर टांग भी रखी थी, ताकि मैं और अंकल केन जैसे लोग इसे पढ़कर प्रेरणा ले सकें।
बहरहाल, अंकल केन के साथ एक और समस्या थी। उनके बाल तेजी से झड़ रहे थे, जिसे लेकर वह काफी परेशान थे। उनकी समस्या के बारे में जान नानी ने अपनी पुरानी किताब में से एक देसी नुस्खा खोज निकाला। इस नुस्खे के मुताबिक खीरे को ब्रांडी में डुबाकर बालों के लिए एक लोशन तैयार किया जाता था। अंकल केन इस नुस्खे को आजमाने के लिए तैयार थे। उनकी गुजारिश पर नानी ने खीरे के टुकड़ों को ब्रांडी की बोतल में हफ्ते भर तक डुबोकर रखा और बाद में इसे अंकल केन को सौंपते हुए ताकीद की कि वह रोज सुबह-शाम सिर में इसकी मालिश करें। लेकिन अगले दिन जब नानी ने उनके यहां जाकर देखा तो उन्हें बोतल में सिर्फ खीरे के टुकड़े ही नजर आए। जाहिर है, अंकल केन इसकी सारी ब्रांडी गटक चुके थे।






