बदलाव को समझें और उसके अनुसार जीवन जिएं
पं. विजयशंकर मेहता | Jul 19, 2012, 00:38AM IST
कृष्ण और शकुनि की दृष्टि में परिवर्तन के अलग-अलग मायने थे। स्वामी सत्यमित्रानंदगिरि विश्लेषण करते हुए बताते हैं, आज हम अर्जुन-दुर्योधन के नवीन संस्करण बनकर घूम रहे हैं। हम देखते हैं कि क्षण-क्षण परिवर्तन हो रहा है। जहां परिवर्तन होता है, वहीं संसार है। परमात्मा अपरिवर्तनीय है। सिखाना यह चाहिए कि परमात्मा अपरिवर्तनशील है। संसार में होने वाले परिवर्तन को हम समझ नहीं पाते। जीवन में होने वाले परिवर्तन को भी हम नहीं देख पाते। परिवर्तन एक तरह से दर्पण है। दर्पण का अर्थ है - ‘दर्प न’, यानी दर्प नहीं करें, अभिमान नहीं करें।
दर्पण की भाषा मूक होती है, हम उसे समझ नहीं पाते। लाख चेष्टा करने पर भी हम परिवर्तन को रोक नहीं पाते। मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति है। वह विवेकशील होता है। उसमें निर्णय करने की शक्ति है, परंतु वह संशय में जीता है। विचार करें कि ऐसा क्यों होता है? हम जिस चिंतन में जीते हैं - जब वह शास्त्रसम्मत नहीं होता तो अपनी ही बुद्धि पर भरोसा कर बैठते हैं, वह भी इसलिए कि हमारी बुद्धि स्वार्थ में लिप्त रहती है। हम जिस चिंतन में जीते हैं, वह शास्त्रसम्मत, महापुरुषसम्मत, आत्मसम्मत होना चाहिए। ‘आत्मानि प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत’ अर्थात आत्मा के प्रतिकूल आचरण न रखते हुए परिवर्तन पर लगातार नजर रखें।






