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पाने की ललक हो तो मिलेगा परमात्मा

पं. विजयशंकर मेहता | Dec 25, 2012, 00:08AM IST
 
 

हमें  इस बात के प्रति जागरूक रहना चाहिए कि हमारे पास कितनी स्मरणशक्ति है। विज्ञान ने शरीर को सुख-सुविधा व रक्षा भले ही दी है, लेकिन कुछ नैसर्गिक क्षमताओं को समाप्त भी कर दिया। साथ ही मनुष्य की चिंतन व स्मरण शक्ति भी कुंद कर दी।
 
सुंदरकांड में रावण इसी विज्ञान की मार का शिकार हुआ। रावण और हनुमानजी दोनों विज्ञान के जानकार थे। मंदोदरी ने जब अपने पति रावण को समझाया तो उसकी प्रतिक्रिया बड़ी विकृत थी। यथा- श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।। सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुं भय मन अति काचा।।
 
यानी, अभिमानी रावण मंदोदरी की वाणी सुनकर खूब हंसा और बोला- स्त्रियों का स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है। मंगल में भी भय करती हो! तुम्हारा मन बहुत कमजोर है। यहां रावण ने पूरी नारी जाति पर प्रतिकूल टिप्पणी कर दी। हर कामयाब आदमी की स्मरणशक्ति इतनी कमजोर हो जाती है कि वह भूल जाता है कि जिन लोगों ने उसे चरम पर पहुंचाया है, उन्हें यूं अपमानित न किया जाए। आंतरिक रूप से तीन काम होते हैं, तब मैमोरी काम करती है।
 
पहले तो हम ज्ञान ग्रहण करते हैं, दूसरा उसे अपने अंतस में रखते हैं और फिर उसे मन के सामने लाते हैं। रावण यही गलती कर गया। ईसा मसीह के अनुसार जिसके पास है उसे दिया जाएगा और जिसके पास नहीं है, उससे वह छीन लिया जाएगा। यह उलटबासी है। जिसके भीतर परमात्मा को पाने की ललक है उसे परमात्मा मिलेगा और जिसके पास नहीं है, उससे वह छीन लिया जाएगा, जो रुकावट है परमशक्ति तक पहुंचने में। रावण जैसे लोगों से इसीलिए इसे छीन लिया जाता है।                                         
 
 
 

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