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उत्तर प्रदेश और अन्ना फैक्टर

 
Source: राजदीप सरदेसाई   |   Last Updated 00:13(13/01/12)
 
 
 
 
अन्ना हजारे के आंदोलन के बारे में हमारा चाहे जो मत हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उनके आंदोलन ने राजनीतिक वर्ग में भय की भावना जरूर पैदा कर दी।

एक ऐसे तंत्र पर अपना नियंत्रण खो देने का भय, जिस पर वे दशकों से काबिज हैं। इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि 74 वर्षीय समाजसेवी के हाल-फिलहाल ‘रिटायर्ड हर्ट’ हो जाने से अनेक राजनेताओं का आत्मविश्वास फिर से लौट आया है। यह कुछ ऐसा ही था कि 2011 में निर्मित हुई प्रेशर कुकर जैसी स्थितियों से राहत पाने के लिए उन्हें कोई सेफ्टी वॉल्व मिल गया हो। राजनेताओं द्वारा स्वयं को अपने सुपरिचित रूप में अभिव्यक्त करने के लिए चुनाव एक बेहतरीन रास्ता मुहैया कराते हैं, लेकिन क्या वास्तव में अब बात पहले जैसी रह गई है?

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक रणभूमि में चुनाव अभियान का बिगुल बजने के बाद से ही लगातार यह लग रहा है कि अन्ना के आंदोलन का असर अब भी किसी हद तक बरकरार है। मायावती को ही लें। पिछले छह माह के अंतराल में लखनऊ की इस सम्राज्ञी ने भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते 20 मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

मायावती ने अपने दबदबे का प्रदर्शन करने में कभी कोताही नहीं बरती, लेकिन जिस तरह उन्होंने अपने कैबिनेट में सफाई अभियान छेड़ा है, उससे यही लगता है कि बसपा सुप्रीमो भलीभांति जानती हैं कि भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि को कितना नुकसान पहुंचाया है।

दलित वोट बैंक के कारण आत्मविश्वास से भरी हुई मायावती ने सालों तक इस तरह के आरोपों की कभी परवाह नहीं की कि वे एक भ्रष्ट हुकूमत की सरपरस्त हैं। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, लगता है कि अब मायावती भी भ्रष्ट नेताओं के प्रति जनता में बढ़ती घृणा की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती हैं।

यहां उत्तर प्रदेश में मायावती की कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी का भी उदाहरण लें। पिछले हफ्ते सपा के नए चेहरे अखिलेश यादव ने कुछ ऐसा किया, जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव शायद कभी नहीं कर पाते। उन्होंने डीपी यादव, जिन्हें कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का निर्विवाद डॉन माना जाता था, को समाजवादी पार्टी में शामिल करने से इनकार कर दिया और डॉन की एंट्री की वकालत करने वाले पार्टी प्रवक्ता मोहन सिंह को भी उनके पद से बेदखल कर दिया। अखिलेश ने बड़े भोलेपन से सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि समाजवादी पार्टी में अब माफिया के लिए कोई जगह नहीं है।

आपराधिकता को प्रोत्साहन देने के आरोपों से दागदार एक पार्टी के लिए अखिलेश का यह कदम एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परिवर्तन की ओर संकेत करता है। मुलायम-अमर सिंह के जमाने में समाजवादी पार्टी को ‘नगद लो और आगे बढ़ो’ पार्टी के रूप में देखा जाता था, जो धनबल और बाहुबल का स्वागत करने को हमेशा तत्पर रहती थी। अब डीपी यादव को पार्टी में शामिल न कर अखिलेश यह संदेश देने की उम्मीद कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी अपने अतीत को भुला देने को तत्पर है।

जो प्रयास अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में अब कर रहे हैं, वह राहुल गांधी काफी समय से करते आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियान के दौरान अपने हर भाषण में राहुल जोर देकर कह रहे हैं दो दशक से उत्तर प्रदेश को कास्ट, करप्शन और क्राइम के फंदे ने जकड़ रखा है, जिससे उसे मुक्त कराना जरूरी है।

जातिगत समीकरण एक ऐसी चुनावी वास्तविकता है, जिसकी कोई पार्टी उपेक्षा नहीं कर सकती, लेकिन आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट नहीं देकर राहुल यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे उन संस्थागत विवशताओं से मुक्त हो जाएंगे, जिसका सामना कांग्रेस जमीनी स्तर पर कर रही है। शायद कांग्रेस के युवराज जानते हैं कि उनकी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश में केवल एक ही उम्मीद है और वह यह कि वे मतदाताओं को आश्वस्त कर पाएं कि केंद्र में हुए तमाम घोटालों के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अब भी सबसे कम भ्रष्ट राजनीतिक दल है।

भाजपा भी यही दावा कर पाने की उम्मीद कर रही थी, लेकिन बाबूसिंह कुशवाहा प्रकरण उसके लिए लगभग एक आत्मघाती गोल ही साबित हुआ। इसकी पार्टी के भीतर और बाहर इतनी तीखी प्रतिक्रिया हुई कि भाजपा को अंतत: यह विचित्र कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा कि बाबूसिंह कुशवाहा स्वयं को तब तक के लिए पार्टी से ‘निलंबित’ कर दें, जब तक उन पर लगे आरोप गलत साबित नहीं हो जाते। शायद, कुछ साल पहले तक भाजपा को इस तरह के प्रकरणों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अब वह यह बिल्कुल वहन नहीं कर सकती कि उसे भ्रष्टों को संरक्षण देने वाली पार्टी के रूप में देखा जाए।

अलबत्ता इन सब घटनाओं में से किसी को भी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की गुणवत्ता में नाटकीय परिवर्तन लाने वाली नहीं माना जा सकता, खासतौर पर दीर्घकालिक चुनाव सुधारों के अभाव में। लेकिन राजनीति का मतलब केवल यथार्थ नहीं, बल्कि अवधारणा भी है। और यहीं पर अन्ना फैक्टर की भूमिका शुरू होती है।

उत्तर प्रदेश के 35 वर्ष से कम आयु वाले अनेक मतदाता, जिनमें से कई शायद पहली बार वोट दे रहे होंगे, वैश्विक आकांक्षाओं से भरे एक ऐसे देश का हिस्सा हैं, जो बदलाव के लिए लालायित है। यह सैटेलाइट टीवी पीढ़ी पिछले लगभग एक साल से टीम अन्ना को भ्रष्टाचार के विरुद्ध नैतिक लड़ाई लड़ रहे दल के रूप में देख रही है। इस पीढ़ी को लोकपाल के बारे में भले ज्यादा न पता हो, लेकिन वह मन ही मन भ्रष्ट नेताओं को परास्त होते देखना चाहती है। जातिगत समीकरणों के परे न देख पाने वाले दल भी यह समझ रहे हैं।

अन्ना हजारे भले ही खुद को रालेगण सिद्धी तक सीमित कर लें, लेकिन राजनीतिक वर्ग के सिर पर उनका साया जरूर मंडराता रहेगा। छह माह पूर्व भाजपा को इसीलिए उत्तराखंड में चुनाव से पहले अपना मुख्यमंत्री बदलने को बाध्य होना पड़ा था। भाजपा-अकाली दल गठबंधन को पंजाब में इसीलिए गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश में इसीलिए हर दल अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है।

पुनश्च : जहां धनबल और भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र को अवमूल्यित किया है, वहीं इससे भी गंभीर संकट राजनीति में परिवारवाद के वर्चस्व के कारण उपजा है। राजनीति अब भी सबके लिए सर्वसुलभ नहीं है। शायद, इसके लिए हमें अन्ना जैसे एक और आंदोलन की जरूरत पड़े। -लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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