बात हो पुलिस सुधार की
Bhaskar News | Jan 03, 2013, 01:07AM IST
दिल्ली में एक 23 वर्षीय युवती से बर्बरता ने महिलाओं की सुरक्षा का सवाल उठाया है, जिसका अभिन्न संबंध पुलिस व्यवस्था से है।
इसलिए केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली पुलिस के कामकाज की समीक्षा के लिए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में 13 सदस्यीय कार्यदल बनाना सही दिशा में कदम है। लेकिन यह पर्याप्त है, यह कहना कठिन है। इसलिए कि कार्यदल को महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों में पुलिस के कामकाज की समीक्षा का काम सौंपा गया है। जबकि समस्या सिर्फ यह नहीं है कि पुलिसकर्मी महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में लापरवाही या संवेदनहीनता दिखाते हैं।
हकीकत यह है कि किसी भी आम नागरिक के प्रति पुलिसकर्मी रूखे ढंग से, बल्कि कई बार क्रूरता से भी पेश आते हैं। पुलिस की अपनी समस्या हो सकती है। मुमकिन है कि आबादी के अनुपात में पुलिसकर्मियों की कमी, उचित सुविधाओं का न होना और आधुनिक समाज की जरूरतों के मुताबिक ट्रेनिंग के अभाव के कारण पुलिसकर्मी अपराध रोकने में सहायक बनने की बजाय कई मौकों पर पीड़ित के उत्पीड़न को बढ़ाने का जरिया बन जाते हों। लेकिन ये तमाम बातें इसी तरफ इशारा करती हैं कि राजनीतिक व्यवस्था ने पुलिस को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुताबिक ढालने की कभी गंभीरता से कोशिश नहीं की। पुलिस सुधार एक पुराना एजेंडा है।
धर्मवीर की अध्यक्षता में पुलिस सुधार आयोग का गठन 1970 के दशक के उत्तरार्ध में जनता पार्टी की सरकार ने किया था। वह रिपोर्ट आज तक ठंडे बस्ते में है। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2006 में पुलिस सुधारों के लिए ठोस दिशा-निर्देश दिए। उन पर कुछ सरकारों ने महज दिखावटी पहल की, तो कुछ सरकारों ने सीधे विरोधी रुख अपना लिया। इसीलिए अभी विभिन्न राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों में महिला समर्थक दिखने की जो होड़ लगी है, उसकी गंभीरता संदिग्ध है।
अगर केंद्र सरकार महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सचमुच गंभीर है, तो उसे सिर्फ दिल्ली की ही चिंता नहीं करनी चाहिए। पुलिस सुधार के मामले में उसकी बड़ी भूमिका है। मॉडल कानून बनाकर वह राज्यों को इस दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकती है। अगर ऐसी पहल होती नहीं दिखी तो जनता में भरोसा पैदा होना कठिन है।






