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आज भी बरकरार है बनारस का ठाठ

 
Source: आशीष महर्षि   |   Last Updated 00:25(11/08/11)
 
 
 
 
आज सिर्फ और सिर्फ बात बनारस की। हर बार की तरह इस बार भी बनारस महादेव के रंग में रंगा है। यूं तो महादेव का रंग हमेशा ही बनारस पर चढ़ा रहता है, लेकिन सावन में यह रंग और चोखा हो जाता है।

बनारस में इन दिनों चारों ओर हर-हर महादेव और बोल-बम गूंज रहा है। जहां नजर जाती है, देश के कोने-कोने से आए कांवड़ियों का सैलाब दिखता है। घाटों का वैभव देखते ही बनता है।
जिन काशी विश्वनाथ का दर्शन हमारे बचपन का नित्य नियम हुआ करता था, वहां बरसों बाद जाना हुआ।

सावन में बाबा का दर्शन करना इतना आसान नहीं है। मोबाइल फोन से लेकर पेन तक को पुलिस वालों ने मंदिर से पहले ही हमसे अलग कर दिया। लेकिन इसके बावजूद लोगों की आस्था कम नहीं हुई। बाबा के दर्शन करके शांति मिली।

वक्त के बहाव के साथ-साथ यह शहर भी बदल रहा है, लेकिन बनारसी ठाठ बरकरार है। अपनी दुनिया में मस्त रहने वाले बनारसियों ने भले ही कितना ही नाम कमा लिया हो, लेकिन बनारस के रंग में वे आज भी रंगे हुए हैं। शहर की प्रमुख चाय की दुकानों पर उमड़ने वाला हुजूम भी बनारस का ही एक रंग है।

बड़े से बड़े नेता हों या पत्रकार, छात्र हों या सामाजिक कार्यकर्ता या गंगा के सहारे जीविका चलाने वाले नाविक या छोटी-छोटी दुकान चलाने वाले दुकानदार, सब इन चाय की दुकानों से ही अपने दिन की शुरुआत करते हैं।

ऐसे ही गदौलिया स्थित ठंडाई की दुकानें बरसों से न सिर्फ बनारसियों की, बल्कि यहां आने वाले लाखों लोगों का गला तर कर रही हैं। रबड़ी-मलाई से लेकर दही की लस्सी तक यहां की खासियत है। हर गली का अपना एक अलग ही मिजाज है।

कई गलियों को पार करने के बाद दालमंडी की गलियों में पहुंचा तो भीड़ में भी अजीब-सी खामोशी महसूस हुई। कभी पूरे हिंदुस्तान को अपने घुंघरुओं की खनखनाहट से नचाने वाली इन गलियों की नगरवधुएं अब खामोश हैं। अब न यहां पहले की तरह मुजरे होते हैं और न ही घुंघरुओं की रुनझुन सुनाई देती है।

कुछ दूर और आगे बढ़ने पर एक पुराने मकान पर नजर पड़ी। किसी जमाने में इस मकान की दीवारों के पीछे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाइयां गूंजती थीं। आज वह भी खामोश है। लेकिन इस इलाके का बाजार गुलजार है। देशी-विदेशी, हर सामान यहां बिक रहा है, बस पुरानी रवायतें लगातार दम तोड़ रही हैं। इनकी कोई कीमत यहां नहीं है।

आसपास की भीड़ के बीच यह खामोशी न जाने क्यों मुझे बेहद खली। गलियों में भटकते हुए एक बात तो साफ हो गई कि दुनिया कितनी भी बदल जाए, लेकिन हजारों साल पुरानी गलियों का स्वरूप कभी नहीं बदलेगा।

काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के इलाके भले ही सुरक्षा की दृष्टि से किसी किले में तब्दील हो गए हों, लेकिन यहां की गलियां आज भी खुली-खिली हैं। चप्पे-चप्पे पर पुलिस की तैनाती भी इन गलियों के पुराने स्वरूप को नहीं बिगाड़ पाई है।

इतना जरूर हुआ कि मंदिर की ओर जाने वाली कई गलियों को पार करने के लिए अब कई सुरक्षा चक्रों से गुजरना पड़ता है। मेरे जैसे बनारसी के लिए यह किसी यातना से कम नहीं। जिस ज्ञानवापी मस्जिद के तालाब में हम स्कूल के दिनों में मछलियों से खेलते थे, वहां आज जाने की सोच भी नहीं सकते।

तीन दिन गंगा की गोद में बिताने के बाद जब वापस लौटा, तो मां की ही तरह गंगा ने भी मेरी झोली खाली नहीं छोड़ी। उन्होंने मेरा मटमैला मन साफ कर दिया है। और साफ मन में नया इंद्रधनुष खिल उठा है।

जिंदगी फिर से खूबसूरत हो गई है। बस मलाल सिर्फ इतना है कि सबको देने वाली और सबके मन का मैल दूर करने वाली गंगाजी खुद न जाने कब तक यूं ही मलिन रहेंगी।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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