नव-वर्ष की आशाएं
Bhaskar News
| Dec 31, 2012, 23:52PM IST
नए साल में हमने बर्बरता की शिकार एक बेटी की मौत का दुख और उससे उपजे आक्रोश को लिए हुए प्रवेश किया है। गतिरुद्ध राजनीतिक व्यवस्था और संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था ने पहले से ही आशंकाएं गहरी कर रखी हैं।
इसलिए यह सहज अनुमान है कि 2013 में हमारी संकल्प-शक्ति की गहरी परीक्षा होगी। इस बीच आशा की किरण वह ऊर्जा है, राजनीतिक एवं सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जिसका विस्फोट सड़कों पर होते पिछले दो साल में हमने देखा।
कहा जाता है कि अत्याचार से बदतर अत्याचार को सहना होता है। लोग जब सहने से इनकार करने लगें, तो उसे बेशक अच्छे दिनों का संकेत समझा जा सकता है। 2011 में भ्रष्टाचार और 2012 में दुष्कर्म के खिलाफ सड़कों पर उतरे नौजवानों में जो चेतना और संघर्ष-भावना दिखी, उसमें हम ऐसे संकेत अवश्य तलाश सकते हैं।
पार्टी और विचारधारा के अर्थ में अ-राजनीतिक रहते हुए भी इन नए आंदोलनकारियों ने राजनीतिक व्यवस्था को संविधान की कसौटियों पर जवाबदेह बनाने के लिए अनोखा संघर्ष किया है। कहा जा सकता है कि इतिहास के इस मोड़ पर भारत नई अंगड़ाई ले रहा है।
समस्याएं चौतरफा हैं, लेकिन उनसे जूझने का नया माद्दा पैदा हुआ है। अगर शासक इस परिघटना को समझने में नाकाम रहे, तो ऐसा वे अपनी जन-वैधता खोने का जोखिम उठाते हुए ही करेंगे। आज की पीढ़ी वैश्विक कसौटियों पर सर्वश्रेष्ठ सार्वजनिक सेवाओं, राजनीतिक व्यवस्था और सांस्कृतिक खुलेपन की मांग कर रही है।
अगर उसकी भावना के मुताबिक व्यवस्था खुद को ढाल सकी, तो उससे अधिक स्पंदनशील लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरफ हम जाएंगे। लेकिन अगर नए युग की नई भाषा से संवाद करने में हमारा राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व विफल रहा, तो सड़कों पर संघर्ष के नए नजारों से देश बच नहीं सकता। हाथ में तिरंगा, जुबान पर अपनी सीधी-सरल मांग और दिल में भारतीय संविधान की भावना लिए निकले नौजवानों को नजरअंदाज करना अब शायद मुमकिन न हो।
2013 हर क्षेत्र के नेताओं के लिए यही संदेश लेकर आया है। अत: भ्रष्टाचार और दुराचार की संस्कृति के खिलाफ कड़े कदम नेताओं का नए साल का संकल्प होना चाहिए। और हमारा संकल्प यह हो कि अगर ऐसा नहीं होता है, तो हम संघर्ष की मशाल जलाए रखेंगे।






