वीआईपी भारत बनाम आम आदमी
राजदीप सरदेसाई
| Dec 28, 2012, 00:17AM IST

बीबीसी के क्लासिक राजनीतिक व्यंग्य सीरियल ‘यस मिनिस्टर’ में मंत्री जिम हैकर अपने वरिष्ठ नौकरशाह सर हंफ्रे एपलबाई से पूछते हैं कि प्रदर्शनकारी समूह से कैसे निपटा जाए। सर हंफ्रे कहते हैं, ‘चिंता न करें सर, सिर्फ उनकी शिकायतों की जांच के लिए एक कमेटी बिठा दें।’ इस पर मंत्रीजी का सवाल होता है, ‘लेकिन क्या इसे सरेंडर के तौर पर नहीं देखा जाएगा?’ सर हंफ्रे मुस्कराते हुए कहते हैं, ‘मंत्रीजी, कमेटियां गठित करने से आपको समय मिल जाएगा और हालात हमारे अनुकूल हो जाएंगे!’
मगर अतीत में जो सच था, अब नहीं है। समय की मान्यताएं सिमट गई हैं। यह 20-20 क्रिकेट, फास्ट फूड, ट्विटर व फेसबुक पर इंस्टेंट मैसेजिंग, 24x7 टेलीविजन का जमाना है, जहां आज की खबर अगले घंटे में इतिहास बन सकती है। सबकी तरह सरकारों को भी नए जमाने के विरोध प्रदर्शनों के साथ तत्परता से तालमेल बिठाना होगा। मगर जैसा हमने पिछले पखवाड़े में पाया कि यहां अब भी युवा-बेताब पीढ़ी तथा राजनीतिक वर्ग (जो मानता है कि सरकार का पहिया अपनी गति से चलना चाहिए) के बीच असंतुलन है।
गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से जब पूछा गया कि क्या उनकी सरकार प्रदर्शनकारियों को ऐसी कोई समयसीमा दे सकती है, जिसके भीतर महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े विभिन्न प्रस्ताव लागू हो जाएंगे, तो उनका जवाब था, ‘आपको तत्काल समाधान नहीं मिल सकते।’ जी मंत्रीजी, आपका कहना सही है। एक पितृसत्तात्मक समाज में, जहां महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता हो, वहां आप रातोंरात नाटकीय नतीजों की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन मंत्रीजी, विरोध की सच्ची आवाजों को सहानुभूतिपूर्वक सुने जाने का तो अधिकार है, न कि उन पर पुराने जमाने की तरह लाठियां बरसाई जाएं।
नॉर्थ ब्लॉक पर गृह मंत्रालय की निषिद्ध दीवारों और इंडिया गेट के बीच दो किलोमीटर से कम फासला है। लेकिन इनके बीच की मनोवैज्ञानिक दूरी बहुत ज्यादा है। इंडिया गेट के ज्यादातर प्रदर्शनकारी ऊर्जावान, उत्साही युवाओं का एक समूह थे, जो एक युवती की रक्षा न कर पाने वाले ‘सिस्टम’ के खिलाफ गुस्से का इजहार कर रहे थे। उनका गुस्सा किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं था। यह एक ऐसी पीढ़ी का आक्रोश था, जो सरकार की कथित उदासीनता और कुशासन के समक्ष खुद को असहाय महसूस करती है। यह ऐसा समूह था, जिसे सांत्वना की दरकार थी। उस वक्त टकराव के बजाय उनके प्रति करुणा दिखाने की ज्यादा जरूरत थी।
मगर हमारा राजनीतिक वर्ग ऐसा करने में चूक गया। जब मैंने गृह मंत्री से पूछा कि क्या उन्हें या उनकी सरकार के किसी वरिष्ठ सदस्य को शुरुआत में ही इंडिया गेट पर प्रदर्शनकारियों से मिलने नहीं जाना चाहिए था, तो उनकी उत्तेजित प्रतिक्रिया थी, ‘सरकारें इस तरह कहीं नहीं जा सकतीं। कल को यह कांग्रेसी कार्यकर्ता हो सकते हैं, तो कभी भाजपा के लोग हो सकते हैं। आप तो हमसे यह भी कह सकते हैं कि हम जाकर सशस्त्र माओवादियों से मिलें। क्या हुआ अगर गढ़चिरौली या छत्तीसगढ़ में 100आदिवासी मारे जाते हैं। आप हमसे वहां भी जाने की उम्मीद करेंगे।’
सच तो यह है मंत्रीजी कि गढ़चिरौली हो या इंडिया गेट, सरकारों को लोगों के पास जाना ही चाहिए। एक ‘वीआईपी’ भारत और एक ‘आम आदमी’ भारत के बीच लगातार पसरती खाई ही मौजूदा संकट के मूल में निहित है। ‘वीआईपी’ भारत को दर्जनों सशस्त्र सुरक्षाकर्मी मिलते हैं, जो दिन-रात उनकी सुरक्षा में लगे रहते हैं। वहीं ‘आम आदमी’ भारत को ऐसी कोई सुरक्षा मयस्सर नहीं है। ‘वीआईपी’ भारत लाल बत्ती कारों में सफर करता है, जबकि ‘आम आदमी’ भारत प्राचीन लोक परिवहन व्यवस्था पर निर्भर है। ‘वीआईपी’ भारत शानदार लोदी गार्डन में टहलता है, जबकि ‘आम आदमी’ भारत मंद रोशनी वाली सड़कों-गलियों से पैदल घर जाता है।
दिल्ली की यह हकीकत दूरदराज के गढ़चिरौली के लिहाज से तो और भी भयावह है, जहां न तो सरकार और न ही टीवी कैमरे नजर डालेंगे। किसी 23 वर्षीय युवती के साथ छत्तीसगढ़ में गैंगरेप होता, तो वह संभवत: एक और आंकड़ा बनकर रह जाती। कोई उसके लिए मोमबत्ती नहीं जलाता और न उसके नाम पर विरोध प्रदर्शन होते। उसकी कहानी तो ‘आम आदमी’ भारत की भी नहीं है, बल्कि यह एक ‘अंधेरा भारत’ है। एक ऐसा अंधेरा क्षेत्र, जहां कुछ ही लोग जाने की हिम्मत करेंगे।
सरकारों के लिए जरूरी है कि वे पारंपरिक लक्ष्मण रेखाओं से पार जाने का साहस और उत्साह जुटाएं। महज शास्त्री भवन में प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करना कम्युनिकेशन नहीं है। सत्ता तंत्र के दायरे से बाहर निकलें और मानवीय स्पर्श को पुन: तलाशें। हमारे देश के सबसे प्रभावी राजनीतिक कम्युनिकेटर महात्मा गांधी ने यही किया होता। वे संभवत: प्रदर्शनकारियों के साथ सड़कों पर बैठते, उनकी बात सुनते, उन्हें एक तरह के नेतृत्व और दिशा का बोध कराते।
यदि ‘प्रोटोकॉल’ गृह मंत्री को इंडिया गेट जाने की इजाजत नहीं देता, तो आप हमारे युवा सांसदों के बारे में क्या कहेंगे? क्या वे एक प्रतिनिधिमंडल के रूप में प्रदर्शनकारियों से जाकर मिलते हुए उनकी शिकायतें नहीं सुन सकते थे? और राहुल गांधी के बारे में क्या कहें, जिन्हें कांग्रेसी चाटुकार ‘यूथ आइकन’ और ‘देश की चेतना’ बताते हैं? क्या राहुल के लिए नेतृत्व की भूमिका अख्तियार करने के लिहाज से युवा महिलाओं की सुरक्षा से बेहतर कोई दूसरा मुद्दा हो सकता था? यह मुद्दा उन्हें नवीन भारत के साथ जरूरी भावनात्मक जुड़ाव कायम करने का मौका दे सकता था।
पुनश्च- डॉ. मनमोहन सिंह नए साल में कुछ मौकों पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिल सकते हैं। जब दोनों वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चर्चा करें, तो ओबामा उन्हें प्रभावी राजनीतिक संवाद के बारे में कुछ उपयोगी सुझाव दे सकते हैं? क्योंकि प्रधानमंत्रीजी, जब आम आदमी तक पहुंचने की बात आती है, तो ‘सब ठीक नहीं है’!







