विज्ञापन
 
Home >> Of Particular Note Was Waiting For This Moment Whe

अन्‍ना की जीत पर विशेष टिप्पणीः इसी क्षण की तो प्रतीक्षा थी देश को

श्रवण गर्ग | Aug 28, 2011, 09:08AM IST
 
 


विक्रम संवत 2068 के भादो मास के कृष्ण पक्ष की तेरस या फिर इक्कीसवीं शताब्दी के वर्ष 2011 के 27 अगस्त के शनिवार का दिन स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक अप्रतिम अध्याय बनकर एक सौ बीस करोड़ नागरिकों के हृदयस्थल पर अंकित हो गया है।
इस अध्याय में लिखा जाएगा कि इस दिन दिल्ली में रामलीला मैदान पर बारह दिनों से उपवास पर बैठे 74 वर्षीय किशन बाबूभाई हजारे उर्फ अन्ना नाम के एक ईमानदार सेवक की नैतिक ताकत का सम्मान करते हुए देश की सर्वोच्च संस्था संसद ने अपने फैसलों में जनता की सीधी भागीदारी को हमेशा-हमेशा के लिए सुनिश्चित कर दिया। और इस प्रकार देश की कमजोर से कमजोर सड़क और पगडंडी भी भारत राष्ट्र की सबसे मजबूत इमारत के साथ जुड़ गई।
राष्ट्र के जीवन का यह अद्भुत, अद्वितीय और ऐतिहासिक दिन था कि महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण के बाद अन्ना हजारे नाम के एक और निहत्थे नागरिक ने अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए उस क्रांतिकारी परिवर्तन को अंजाम दिया जिसकी दुनिया के और किसी भी हिस्से में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। क्या कोई कभी सोच भी सकता था कि संसद का एजेंडा जनता की ताकत तय करेगी, जनप्रतिनिधियों की संख्या और पार्टियों की ताकत नहीं।
सरकार और प्रतिपक्ष का एक नया चेहरा इस जनांदोलन के जरिए देश को प्राप्त हुआ है जो कि कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है। हम उम्मीद कर सकेंगे कि हमारे शासक और राजनीतिक दलों के आका अब जनता के साथ उसके मालिकों के बजाए सेवकों की तरह व्यवहार करने लगेंगे। जिस संसद की अवमानना का खौफ दिखाकर जनता की ताकत को कमजोर करने की कोशिश की जा रही थी वही संसद अपने सदस्यों द्वारा अन्ना के प्रस्तावों पर मेजें थप-थपाकर सर्वसम्मति से स्वीकृति दे देने के बाद पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा ताकतवर होकर उभरी है। अपने प्रतिनिधियों के प्रति जनता का यकीन और ज्यादा मजबूत ही हुआ है।
सत्ता के अहिंसक और शांतिपूर्ण हस्तांतरण की यह गूंज अब दूर-दूर तक सुनाई देगी। हमारे पड़ोसी देशों और दुनिया के दूसरे मुल्कों की जनता को अब ताकत मिलेगी कि सत्ता में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित करवाने का वह रास्ता अभी गुम नहीं हुआ है जिसे गांधी ने ईजाद किया था। शर्त केवल यही है कि परिवर्तन की अगुवाई करने वाले की आंखों में बेईमानी का काजल नहीं बल्कि ईमानदारी का साहस होना चाहिए। अन्ना ने सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होने वाली अपनी बहादुर टीम के जरिए ऐसा सिद्ध करके भी दिखा दिया।
प्रधानमंत्री और देश की संसद अन्ना के साहस को पहले से सलाम कर चुकी है, अब दुनिया का नेतृत्व उसकी तैयारी कर रहा है। अन्ना का अनशन आज समाप्त हो जाएगा और उनके स्वास्थ्य की प्रार्थना में उठे हाथ और तमाम चिंताएं प्रसन्नता के आंसुओं में तब्दील हो जाएंगी। पर अन्ना का केवल अनशन खत्म हो रहा है, उनकी लड़ाई नहीं। वह चलती रहने वाली है, लोकपाल बिल पारित होने तक। उसके बाद भी।
अपने अनशन के दौरान अन्ना कई बार कह चुके हैं : अन्ना रहे न रहे, मशाल जलती रहना चाहिए। प्रधानमंत्री का पत्र विलासराव देशमुख के हाथों प्राप्त करने के बाद अन्ना ने कहा भी है कि वे अभी आधी लड़ाई जीते हैं, पूरी जीत होना अभी बाकी है। थोड़ी बधाई तो डॉ. मनमोहन सिंह के लिए इसलिए भी बनती है कि बारह दिनों की प्रतीक्षा के बाद जिस क्षण की वे प्रतीक्षा कर रहे थे वह उन्हें अनशन समाप्त करने की अन्ना की घोषणा के साथ शनिवार की रात नौ बजे प्राप्त भी हो गया और संसद का सम्मान भी कायम रखने में वे कामयाब हो गए।

 
 
 

आपके विचार
 
 
कोड:
7 + 8

 
Ad Link
विज्ञापन
विज्ञापन
 
 
 
 
Job Alerts
 
 

बड़ी खबरें

रोचक खबरें

विज्ञापन

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

क्रिकेट

बिज़नेस

जोक्स

पसंदीदा खबरें

Email Print Comment
Email Print Comment