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खुशियां हमसे नहीं हम खुशियों से दूर हैं

यास्मीन सिद्दीकी | Apr 28, 2012, 00:18AM IST
 
 

भास्कर ब्लॉग. . अरे भागो जीशान, वरना तुम पीछे रह जाओगे। ये जलेबियां बाद में खा लेना। अरे भागो न..! लेकिन वह नहीं सुनता था। जलेबी दौड़ में हमेशा हिस्सा लिया करता था कि पीछे हाथ बांधकर उचक-उचककर जलेबियां खाने को मिलेंगी। स्पोर्ट्स डे पर रेस के दौरान वह सबसे पहले जलेबियों के पास पहुंच जाता। लेकिन जलेबी खाने में इतना मसरूफ कि बेचारा आखिर की तरफ से ही फस्र्ट आ पाता था।



लेकिन उसके चेहरे पर हारने से कहीं बढ़कर होती थी जलेबियों पर पाई वह जीत। वह मेरा भाई, जिसे कितना भी घर से समझाकर लाओ कि अगर तुम जीते तो जितनी चाहो उतनी जलेबियां खाओगे, लेकिन लटकी हुई उन सूखी जलेबियों में क्या स्वाद होता था कि बस वह उनमें ही उलझकर रह जाता था। हारने के बाद भी उसके चेहरे पर मायूसी नहीं, बल्कि खुशी के ही भाव होते थे।


लेकिन क्या हम बड़े जो आगे बढ़ने की इस रेस में शामिल हैं, कभी इस बात को समझ सकते हैं? शायद नहीं। पता नहीं क्यों बचपन वाली यह रेस जिंदगी की इस रेस से इतनी अलग क्यों हैं? यहां पर तो हम सभी भाग रहे हैं, किसके पीछे और किसको पीछे छोड़ते हुए, पता नहीं।


एक ही बात - आगे बढ़ो, दौड़ो नहीं तो सबसे पीछे रह जाआगे। हार-जीत के इस खेल में जिंदगी जीने का मजा तो पता नहीं कहां खो गया। जीतने के बाद भी जीत की खुशी क्यों नहीं होती? क्यों एक टारगेट पाने के बाद दूसरा टारगेट मुंह चिढ़ाता नजर आता है? जैसे कह रहा हो, ये जो तुमने पाया है, बहुत छोटा-सा पड़ाव है। अब आएगा खेल का असली मजा।



जिंदगी का यह खेल चुनौती क्यों बन गया? फिर कोई क्यों कहता है - ‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है। मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं।’ अब तो आसपास देखकर लगता है, जिंदगी दौड़ने का नाम है। जो सबसे तेज दौड़ेगा, वह जीतकर रहेगा। लगता है जैसे हम इंसान नहीं घोड़े हैं। कांपीटिशन के वे घोड़े, जिनमें दिमाग तो इंसानों वाले हैं, लेकिन उनका दिल, उनकी धड़कनें, उनके अरमान रेस में कहीं दब गए। तभी तो हम कुछ भी पा लें, खुशी होती ही नहीं। होंठ जैसे मुस्कराना भूल ही गए। वरना अगर मानो तो हर दिन दिवाली और हर रात ईद है। कितने अजीब हालात हैं। जीने की कला हम भूल गए और जीतने की कला में भी हम पारंगत नहीं हो पाए।


हमसे अच्छे तो बच्चे हैं, जो अपनी पैसों वाली गुल्लक में कुछ सिक्के जमा कर समझते हैं, जैसे बहुत बड़ा खजाना उनके हाथ में है। और सच तो यह है कि वो खजाना कभी खत्म ही नहीं होता। बच्चे जो स्कूल की पिकनिक पर जाने से पहले ही पिकनिक का नाम सुनकर ही खुश हो जाते हैं। और तो और, अगर मां ने लंच में उनके लिए स्पेशल वनिला कस्टर्ड भी बना दिया तो बस पूरा दिन ही बन गया। और अगर नाराज हुए तो मम्मी के हाथों का बना चॉकलेट केक नाराजगी दूर करने के लिए काफी है।



कभी सोचा है, हम क्यों नहीं खुश हो पाते चॉकलेट केक से? घर के बगीचे में आई वो तितली हमें अपने पीछे दौड़ने को मजबूर क्यों नहीं करती? क्यों जब हवाई जहाज हमारे सिर के ऊपर से गुजर जाता है, हमें पता तक नहीं चलता? शायद जिंदगी की ये छोटी-छोटी खुशियां हमारी बड़ी-बड़ी जीत से कहीं बड़ी हैं। कम से कम ये हमें खुश और अच्छा इंसान तो बने रहने देती हैं। खुशियां हमसे नहीं, हम खुशियों से दूर हैं। बस एक बार फिर से बच्चे बन जाइए, फिर देखिए जलेबी रेस में चाहे जीतें या हारें, मजा तो सभी को आएगा। कामयाब भले ही न हो पाएं, लेकिन खुश होने की गारंटी तो यहां है।
 
 
 

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