हम पाखंड के पक्षधर क्यों?
Source: चेतन भगत | Last Updated 02:19(09/02/12)
कर्नाटक विधानसभा में मंत्रियों द्वारा पोर्न देखने की घटना हमारी उबाऊ विधानसभाओं में से उभरकर आने वाली गिनी-चुनी रोचक कहानियों में से एक है। हमारे नेता क्लिंटन जैसे बांके-छबीले तो हैं नहीं कि वे उनके जैसे कारनामे कर पाएं। कम से कम उन्होंने अपने सेलफोन पर ही कुछ मजा करने की कोशिश तो की। २जी लाइसेंस सस्ते में बेच देना हो या ३जी पर पोर्न देखना, लगता है हमारे नेताओं और टेलीकॉम का आपस में कोई न कोई गहरा नाता जरूर है।
विडंबना गहरी है। कर्नाटक विधानसभा में पोर्न देखने वाले दो मंत्रियों में से एक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मंत्री हैं। उन्होंने लड़कियों को हिदायत दी थी कि छेड़खानी और ज्यादती से बचने के लिए उन्हें आपत्तिजनक कपड़े नहीं पहनना चाहिए। साथ ही, सदन में पोर्न देखने की यह घटना एक ऐसे राज्य में हुई है, जहां संस्कृति के स्वघोषित संरक्षकों ने जींस पहनने वाली या वैलेंटाइंस कार्ड स्वीकार करने वाली लड़कियों को प्रताड़ित किया था। क्या अब वे बहादुर संरक्षक मंत्रियों के बंगलों पर जाकर उनके मुंह पर भी कालिख पोतेंगे? वास्तव में कोई और विषय भारतीयों के पाखंड को इस तरह उजागर नहीं करता, जिस तरह सेक्स और उससे संबंधित बातें करती हैं। यह शब्द सुनते ही हम झेंप जाते हैं और ऐसा दिखावा करने लगते हैं, जैसे कि इसका कोई अस्तित्व ही न हो। हम बगलें झांकने लगते हैं और विषय बदलने का प्रयास करने लगते हैं। सेक्स के बारे में बात करने वाले हर व्यक्ति को हम मन ही मन कोसने लगते हैं और इस पर स्वस्थ-संतुलित बहस से बचने की हरसंभव कोशिश करने लगते हैं।
आम तौर पर कहा जाता है कि सेक्स से जुड़ी बातें भारतीय संस्कृति के विपरीत हैं। दुनिया की दूसरी सबसे घनी आबादी वाले देश में इस तरह की धारणा का होना विचित्र ही लगता है। शायद संस्कृति के संरक्षक यह कहना चाहते हैं कि मजे के लिए सेक्स करना बुरा है और चूंकि भारतीय संस्कृति में बुराई का कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए सेक्स भी बुरा है। इसीलिए विधानसभा में बैठकर पोर्न देखने वाले ये मंत्री ही सदन के बाहर इस तरह की बातें कहते हैं कि महिलाओं को सिर से पैर तक कपड़ों से लदा होना चाहिए, विवाह से पूर्व यौन संबंध अनैतिक हैं और हर वह चीज, जिसका सेक्स से दूर-दूर का भी कोई नाता है, उस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। और इसके बावजूद मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं कि हमारे बहुतेरे मंत्री, सांसद, विधायक और बाबू टाइप के लोग पोर्न देखते होंगे। वास्तव में हर वह भारतीय, जिसकी पोर्नोग्राफी तक पहुंच है, पोर्न देखता होगा। अलबत्ता कुछ ही बहादुर और दिलेर ऐसे होते हैं, जो विधानसभा में बैठकर भी ऐसा करने की हिम्मत कर पाते हैं।
ऐसा क्यों हैं? हम एक प्राकृतिक क्रिया के बारे में इस तरह का दोमुंहा रवैया क्यों रखते हैं? इस सवाल का जवाब देना कठिन है, लेकिन इतना जरूर है कि हम हमेशा से ऐसे न थे। हमारे प्राचीन ग्रंथों में यौन विषयों पर विस्तार से बात की गई है। हमारे ग्रंथों में बहुपतिवाद और बहुपत्नीवाद के ऐसे उदाहरण हैं, जो आज भी साहसपूर्ण लगते हैं। खजुराहों के मंदिरों के शिल्प को देखकर लगता है कि इन्हें रचने वाले हमारी कल्पनाओं के हर कोने में झांक आए हैं। शायद मुगल और विक्टोरियन शासन के दौरान हमारे रवैये में बदलाव आया। ये दोनों ही साम्राज्य अपने उदारवादी विचारों के कारण नहीं जाने जाते थे। इसी में जातिगत श्रेष्ठता और शुद्धतावादी आग्रहों को भी जोड़ दें तो हम पाएंगे कि धीरे-धीरे हम हर भौतिक सुख के प्रति उपेक्षा और ग्लानि का भाव रखने लगे, खास तौर पर दैहिक सुख।
इसीलिए अल्कोहल पर भारी मात्रा में टैक्स लगाया जाता है। मिसाल के तौर पर ऑस्ट्रेलियाई शराब की एक बोतल एक हजार रुपए में बिकती है, जबकि उसके आयात की लागत २क्क् रुपए से भी कम है। हमारे यहां गुजरात जैसे राज्य में मद्यपान पर पाबंदी है। फिल्मों के टिकट पर मनोरंजन कर लगता है, जबकि उन्हें खरीदने वाले लोग पहले ही आयकर चुका रहे होते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि यदि सरकार का बस चलता तो वह सेक्स पर भी टैक्स लगा देती! लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इन करों और प्रतिबंधों से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। जिन्हें पीना है, वे पीते हैं, फिर उन्हें घटिया शराब ही क्यों न पीनी पड़े, जो उनकी सेहत को नुकसान पहुंचाती है। शराब पर पाबंदी लगाने से सबसे ज्यादा फायदा तो शराब की तस्करी करने वालों को होता है। फिल्म टिकटों की महंगी दर के कारण लोग पाइरेटेड फिल्में देखते हैं और इससे अंतत: फिल्म इंडस्ट्री को नुकसान पहुंचता है। लेकिन हमारी सरकार और हमारी संस्कृति के संरक्षक इस सीधी-सी बात को समझने की कोशिश नहीं करते कि लोगों को इस तरह रोका नहीं जा सकता। खास तौर पर भारत जैसे देश में, जहां कानून के पालन में ढील-पोल होती है। पाबंदियां लगा देने से लोग इन चीजों से दूर नहीं हो जाते, बस इतना ही होता है कि हम पाखंडियों का एक समाज बनकर रह जाते हैं।
इसीलिए महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ज्यादा बुरा क्या है : पोर्न देखना या बेईमान होना? मैं तो चाहूंगा कि हम बेईमान होने को ही ज्यादा बुरा समझें। हमारे यहां पोर्नोग्राफी कानून १९६९ में लागू किया गया था, लेकिन उसके प्रावधान गुजरे जमाने के हैं। क्या हम एक अधिक व्यावहारिक कानून नहीं बना सकते? क्या हम भौतिक सुखों को पाप मानना बंद नहीं कर सकते? हां, अति हर चीज की बुरी होती है, फिर वह शकर की हो या शराब की या पोर्न की, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम उपभोग को ही अनैतिक या असांस्कृतिक मानने लगें। कर्नाटक में जो हुआ, वह हास्यास्पद था। इससे हमारे नेताओं का छद्म भी उजागर हुआ। लेकिन इससे पहले कि यह घटना हमारे राष्ट्रीय पाखंड का एक और उदाहरण बने, हमें इसका इस्तेमाल अपने नैतिक मानदंडों पर पुनर्विचार करने के लिए करना चाहिए। समय आ गया है कि हम अपनी खुशियों को लेकर कंफर्टेबल हों और हम जो नहीं हैं, वह दिखावा करने की कोशिश न करें।
और अंत में, कर्नाटक के मंत्रियों के लिए एक सीधा-सा सुझाव। हमारे माननीय सांसद-विधायकगण बात-बेबात पर सदन का बहिष्कार करने के आदी हैं। यदि उनके सेलफोन में ऐसी कोई क्लिप है, जिसे वे देखना चाहते हैं तो सदन के पटल पर जो कुछ भी कहा जा रहा हो, उसका विरोध करें और एक नायक की तरह वहां से बाहर चले आएं। और इसके बाद जो भी देखना हो, उसे जूम करके देखें और मजा लें।
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