हमारे भीतर दो बातों का संघर्ष चलता ही रहता है - हिंसा और अहिंसा। बाहर भले ही हम प्रदर्शित न करें, लेकिन भीतर ही भीतर कभी-कभी हम इतने हिंसक हो जाते हैं कि यदि उसे क्रियान्वित कर दें तो शायद कानून के दायरे में आ जाएं और दंड भोगना पड़े। अहिंसा और हिंसा की यही वृत्ति हमें शांति और अशांति की ओर ले जाती है। आजकल आसानी से कोई भी काम होना कठिन है। ऐसे में भीतर से हमारे हिंसक होने की संभावना बनी रहती है और यदि जीवन के उद्देश्य पाना हों तो अपने भीतर की हिंसा को निमरूल करना पड़ेगा। जब हम भीतर से हिंसक होते हैं तो हमारी बाहरी क्रियाएं भी प्रभावित होती हैं। हमारा व्यवहार रूखा हो जाता है, जोर से बोलने लगते हैं और ऐसे में हमसे संबंधित लोगों से या तो हमारे रिश्ते खराब हो जाते हैं या वे भी इसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं। कुल मिलाकर सारी ऊर्जा जिस रचनात्मक कार्य में लगनी चाहिए, वहां से हटकर उलझनों में ही लग जाती है। हम भीतर से जितना अहिंसक होंगे, शांत होंगे, उतना ही अच्छा प्रभाव आसपास के लोगों पर डालेंगे। हमारी अशांति दूसरों के शरीर पर अपना प्रभाव रखती है और हमारी शांति दूसरों की चेतना पर अपना असर डालती है। अशांति समय, ऊर्जा और संबंध तीनों को नष्ट करती है तथा शांति इन तीनों को मजबूत करती है, क्योंकि प्रकृति का मूल स्वभाव है शांत रहना। इसलिए कोई भी काम करें, प्रकृति से जुड़े रहें, पेड़-पौधों से ऊर्जा प्राप्त करते रहें और अपने आसपास के वातावरण में उस शांति को फैलाते रहें। आपके लिए प्रत्येक कार्य करना सरल हो जाएगा।
humarehanuman@gmail.com