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कांग्रेस और भाजपा में फर्क क्या है?

वेद प्रताप वैदिक | Oct 03, 2012, 04:40AM IST
 
 

सूरजकुंड में से कोई सूरज क्यों नहीं उगा? सिर्फ कुछ किरणों ही फूटीं, वह भी लालकृष्ण आडवाणी के अधबोले भाषण से। भाजपा की कार्यकारिणी और राष्ट्रीय समिति का यह अधिवेशन आखिर क्यों आयोजित किया गया था? इसीलिए न कि कांग्रेस के डूबते हुए सूरज को अलविदा कहा जाए और भाजपा के सूरज को क्षितिज से ऊपर उठाया जाए। लेकिन भाजपा का सूरज अपने बोझ से ही इतना भारी हो गया है कि उसे ऊपर उठाने के लिए अब सबल कंधों की जरूरत है।





कांग्रेस का सूरज तो अपने आप डूब रहा है। उसे डुबोने के लिए भाजपा की जरूरत नहीं है। इसके लिए स्वयं कांग्रेस ही काफी है, लेकिन क्या भाजपा कांग्रेस का विकल्प बन रही है? यह विकल्प नहीं, कार्बन-कॉपी बन रही है। जैसे कांग्रेस लगभग नेतृत्वविहीन हो गई है, वैसे ही भाजपा को अब भी नेतृत्व की तलाश है। युद्ध सिर पर है और दोनों सेनाएं अपने सेनापतियों को तलाश रही हैं। पिछले प्रादेशिक चुनावों ने राहुल गांधी को अपना सही ठिकाना बता दिया। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह प्रतिदिन यह सिद्ध करते चले जा रहे हैं कि वे चले हुए कारतूस हैं।





अब सवाल यह है कि कांग्रेस को कौन संभालेगा? यही सवाल मुंह खोले खड़ा है, भाजपा के सामने। नितिन गडकरी अध्यक्ष जरूर हैं और अपनी अध्यक्षीय भूमिका आशा से बेहतर निभा रहे हैं, लेकिन भाजपा में उन्हें नेता मानने के लिए कौन तैयार है? भाजपा में आधा दर्जन से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानते हैं। इसमें शक नहीं है कि हमारे पिछले ज्यादातर प्रधानमंत्रियों की तुलना में वे श्रेष्ठ हैं, लेकिन क्या उनमें से किसी एक को पार्टी आगे करने को तैयार है? मान लें कि पार्टी किसी को आगे कर भी दे, तो क्या देश उसे अपना नेता मान लेगा? जो अपने आप आगे हुए थे, यानी लालकृष्ण आडवाणी, उन्हें पहले संघ ने और फिर पार्टी ने टंगड़ी मारकर पटक दिया। जब टंगड़ी मारने वालों को होश आया तो पिछले चुनाव में फिर से उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बना दिया। पार्टी ने उन्हें मान भी लिया, लेकिन पार्टी तो देश नहीं है न!






सूरजकुंड अधिवेशन में से इस बार टीवी और अखबारवालों ने दो नाम चमकाए। नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान के। नरेंद्र मोदी का नाम तो पहले से मैदान में है। इसमें शक नहीं कि प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी सफल हो सकते हैं, लेकिन अंगूर बहुत खट्टे हैं। भारत गुजरात नहीं है। मोदी के नाम पर सारा भारत बंट सकता है। कोई नहीं कह सकता कि ऊंट किस करवट बैठेगा? हां, कुछ ऐसी चमत्कारिक या अनहोनी घटनाएं हो जाएं, जो कि मोदी की बुराइयों पर पर्दा डाल दें और अच्छाइयों को ऐसा उभार दें कि वे भारत के लिए अपरिहार्य मालूम पड़ें तो निश्चय ही वे भारतीय राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं। लेकिन मोदी के आने की खिड़की खुली नहीं कि भाजपा के कई दरवाजे बंद होने शुरू हो जाएंगे।






पार्टी के अंदर तो संग्राम छिड़ेगा ही, गठबंधन भी टूटने की कगार पर पहुंच जाएगा। जहां तक शिवराज सिंह चौहान का प्रश्न है, उनकी मर्यादित और संतुलित शैली उन्हें अभी मध्यप्रदेश तक ही सीमित रखती है, लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इस तरह के नेता पक्ष और विपक्ष, दोनों को अनुकूल पड़ते हैं। भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए जिस मानसिक और बौद्धिक तैयारी की जरूरत होती है, पता नहीं उसकी तरफ चौहान ने कभी ध्यान दिया या नहीं? कांग्रेस में चौहान जैसे दर्जनों नेता हैं, लेकिन जैसे उनका उभरना एक परिवार के हाथ में है, वैसे ही भाजपा भी एक परिवार की बंदिनी है। यह कैसी विडंबना है कि देश के दोनों बड़े दल परिवारवाद के शिकार हैं। यह भारतीय लोकतंत्र का अभिशाप है कि दोनों बड़े दलों का नेतृत्व ‘ऊध्र्वमूल’ है। यानी उसकी जड़ें जमीन में नहीं, छत में हैं।






इसीलिए जरा गौर से देखें तो दोनों दल एक-दूसरे की नकल करते हुए पाए जाते हैं। आडवाणीजी कहते हैं कि भ्रष्टाचार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। मनमोहन सिंह और उनके पैरोकार यह कहते नहीं थकते कि वे सदाचार की प्रतिमूर्ति हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं कि वे भ्रष्टाचारियों के शतछिद्र (सौ छेदों वाले) कवच बन गए हैं? और भाजपा, जो येदियुरप्पा, रेड्डी और कुशवाहा को धक्का मारकर बाहर नहीं निकालती, किस हिम्मत से कांग्रेस पर उंगली उठाती है? न तो उसका भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान कुछ धार पकड़ रहा है और न ही विदेशी निवेश-विरोधी आह्वान। दोनों पार्टियों की आर्थिक नीतियां एक ही सिक्के के दो पहलूभर हैं। इसी प्रकार ‘सेक्युलर’ दिखाई पड़ने का नाटक दोनों को अत्यंत प्रिय है। बजाय इसके कि भाजपा सावरकर के हिंदुत्व की नई व्याख्या करती, वह १क् साल पुरानी लकीर को ही पीटे चले जा रही है। इस बौद्धिक अपंगता का इलाज कांग्रेस की नकल करने से नहीं होगा।







भाजपा के सूरजकुंड अधिवेशन ने कांग्रेस की मिटती हुई लकीर के नीचे एक फीकी-सी अपनी लकीर खींच दी। क्या कोई सशक्त विपक्षी पार्टी इस तरह काम करती है? यह तो एवजी काम हुआ। यदि इस एजेंडे से भाजपा सत्ता में आ गई तो वह कांग्रेस की तरह कुर्सी तोड़ने के अलावा क्या करेगी? क्या उसके पास अपना कोई सपना है? क्या उसके पास देश के ९क् करोड़ गरीबों के उद्धार के लिए कोई वैकल्पिक योजना है? क्या उसके पास दक्षेस राष्ट्रों को यूरोपीय संघ जैसे किसी एक सूत्र में गूंथने का मंत्र है? भ्रष्टाचारमुक्त भारत बनाने का क्या कोई ठोस संकल्प उसके पास है? क्या उसके पास कोई एक केंद्रीय विचार या नेता है, जिसे ध्रुव-ध्वज बनाकर वह चुनाव के मैदान में उतर सके? क्या उसके पास कांग्रेस से बड़ी कोई लकीर है? नेताओं के खाली दिमाग में सिर्फ कुर्सियां भरी हुई हैं। इन कुर्सीबाज नेताओं से, वे चाहे किसी भी पार्टी के हों, जनता का मोहभंग हो चुका है। पार्टियों के साधारण कार्यकर्ता भी परेशान हैं। जन-आंदोलनों की भी हवा निकल चुकी है। तथाकथित जन-आंदोलन के शव पर नए राजनीतिक दल खड़े किए जा रहे हैं। दलों के इस दलदल से भारत को उबारने वाली क्या कोई लहर जल्दी ही उठेगी?


(लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।)
 
 
 

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