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अभिव्यक्ति की यह कैसी आजादी?

वेदप्रताप वैदिक | Sep 19, 2012, 08:10AM IST
 
 

पश्चिम के दिमाग को क्या हो गया है? यूरोप और अमेरिका के लोग अपनी दिमागी आजादी को खींचकर इतनी लंबी कर देते हैं कि वह तार-तार हो जाती है। आजादी खुद तो तार-तार होती ही है, उसके कारण दुनिया के कई देशों की शांति और व्यवस्था का ताना-बाना भी तार-तार होने लगता है। कभी कोई फूहड़ व्यंग्य-चित्र, कभी कोई अश्लील पुस्तक, कभी कोई आक्रामक फिल्म और कभी कोई उत्तेजक भाषण कारण बन जाता है, विश्वव्यापी प्रदर्शनों और हिंसक घटनाओं का।





कैलिफोर्निया में बनी ‘इनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स’ आजकल ऐसा ही कारण बन गई है। इस फिल्म के कारण अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक और ब्रिटेन से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक सरकारों की नींद हराम हो गई है। लीबिया में भीड़ ने अमेरिकी राजदूत क्रिस स्टीवेंस की हत्या कर दी। मिस्र, सूडान, सीरिया, यमन, इराक, ईरान जैसे पश्चिम एशियाई देशों में लगातार हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन आश्चर्य है कि उस कुख्यात फिल्म के निर्माता नकौला वसीली नकौला नामक अमेरिकी नागरिक को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। अमेरिकी पुलिस ने सिर्फ पूछताछ के लिए उसे थाने में बुलाया भर है।





अखबारों का कहना तो यह है कि उसे पुलिस संरक्षण दिया जा रहा है। यह सब क्यों हो रहा है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर! राष्ट्रपति बराक ओबामा और विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने नकौला की आलोचना तो की है, लेकिन यह भी कह दिया है कि अमेरिकी सरकार का उस फिल्म से कुछ लेना-देना नहीं है। यही बात कई अमेरिकी अखबार भी कह रहे हैं। स्वयं फिल्म-निर्माता नकौला को तनिक भी खेद नहीं है। नकौला मूलत: मिस्र का कॉप्टिक ईसाई है, जो अब अमेरिका का नागरिक बन गया है। वह अपराधी-वृत्ति का आदमी है। वह पहले भी धन की धांधली में जेल काट चुका है। उसने 1994 में इस्लाम की निंदा करते हुए जो किताब लिखी थी, उसी पर एक फिल्म बना दी है। यह फिल्म यू-ट्यूब पर चढ़कर सारी दुनिया में पहुंच चुकी है। इस फिल्म में इस्लाम की अनेक पवित्र घटनाओं को तोड़-मरोड़कर अश्लील रूप देने की फूहड़ कोशिश की गई है।






फिल्म-निर्माता ने पैगंबर मोहम्मद साहब के बारे में अनेक मनगढ़ंत और घोर आपत्तिजनक दृश्य दिखाए हैं। इनसे मुसलमानों को ही नहीं, किसी भी इंसान को जुगुप्सा होने लगेगी। क्या यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? यह कौन-सी अभिव्यक्ति है? इसे अभिव्यक्ति कहें या विष-वमन? अभिव्यक्ति तो वह रक्षणीय है, जिसमें यथार्थ हो, तर्क-वितर्क हो। उसमें असहमति, निंदा, व्यंग्य और आक्रमण भी हो सकते हैं, लेकिन जिस अभिव्यक्ति का लक्ष्य सिर्फ घृणा और हिंसा फैलाना हो, उसकी स्वतंत्रता तो शुद्ध अराजकता है। इस अराजकता को स्वतंत्रता समझने वाला पश्चिमी जगत अभी तक अपनी गाड़ी इसीलिए धका पा रहा है कि वह मूलत: एकायामी समाज है। यदि उसके अनेक आयाम होते, जैसे कि भारतीय समाज के हैं, तो उसकी दृष्टि अधिक संयत व मर्यादित होती। यह कोई संयोग नहीं है कि भारत सरकार ने अपनी इंटरनेट व्यवस्था से उस फिल्म को तुरंत निकाल बाहर किया।






सहिष्णुता का यह रूप पश्चिमी समाज में सहज भाव इसलिए नहीं बन सका कि वहां गौरवंशीय और ईसाई जनसंख्या का लगभग एकाधिपत्य है। वहां ‘अन्य’ लोग इतने कम और प्रभुत्वहीन हैं कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ईसाइयत के विरुद्ध वैसा दुस्साहस कर ही नहीं सकते, जैसा कि इस्लाम या हिंदू या बौद्ध धर्म के विरुद्ध ईसाई संप्रदाय के या नास्तिक लोग कर देते हैं। यह ठीक है कि ईसाइयत के विरुद्ध बगावत करने वाले ईसाइयों की समृद्ध परंपरा पश्चिम में रही है, लेकिन अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता सामूहिक घृणा का रूप कदाचित ही धारण कर पाती है। इस्लाम के विरुद्ध प्रसारित इस फिल्म के खिलाफ पश्चिमी देशों में भी प्रदर्शन अवश्य हो रहे हैं, लेकिन वे नक्कारखाने में तूती की तरह हैं। प्रदर्शनकारी ‘अन्य’ लोग ही हैं, लेकिन उनका बल और प्रभाव वहां कितना है?





पश्चिम की इस वैचारिक अराजकता पर असली प्रतिक्रिया तो पश्चिम एशिया और अन्य मुस्लिम देशों में हो रही है। इन देशों के समाजों की भी स्थिति लगभग वही है, जो पश्चिमी देशों की है। इन देशों में भी प्राय: एक मजहब को मानने वाले और एक वंश के लोगों की बहुतायत होती है। यदि इन देशों में भी भारत जैसी विविधता होती, तो उनकी सहनशीलता भी जरा गहरी होती। इन देशों में भी वैचारिक विद्रोह की अविरल परंपरा रही है और इस्लाम के आगमन के पहले से रही है। स्वयं इस्लाम पारंपरिक अरबी पोंगापंथ के विरुद्ध एक इंकलाबी तहरीक का नाम ही है, लेकिन अब यदि कहीं जरा-सी भी आपत्तिनजक बात कोई कह दे, तो इस्लामिक देशों के कुछ तबके इतने बेकाबू हो जाते हैं कि वे अपना ही नुकसान कर बैठते हैं।






इसका मतलब यह नहीं कि इस्लाम के विरुद्ध कही गई किसी भी निराधार और आपत्तिनक बात पर उदासीनता का रवैया अपना लिया जाए। उसका तगड़ा जवाब दिया ही जाना चाहिए, लेकिन बात का जवाब क्या लात से देना जरूरी है? हाथ और लात चलाने का अंजाम क्या होता है? दो-चार अमेरिकी जरूर मारे जाते हैं, लेकिन उनके मुकाबले सैकड़ों आस्थावान लोगों के प्राणों की आहुति चढ़ जाती है। आकस्मिक आक्रमण में कभी-कभी विदेशियों के दूतावासों या उनकी संपत्तियों का नुकसान हो जाता है, लेकिन ज्यादा नुकसान अपनी ही संपत्तियों का होता है। इसके अलावा सबसे बुरी बात यह होती है कि इस तरह की कार्रवाइयों को अंधाधुंध विश्वव्यापी प्रचार मिलता है।





इसके परिणामस्वरूप उन निंदित फिल्मों या काटरूनों को करोड़ों की संख्या में लोग देखते हैं। जो चीज घृणास्पद और मूर्खतापूर्ण होने के कारण अपने आप नेपथ्य में चली जाती, उसे ये अतिरंजित प्रदर्शन विश्वमंच पर सुसज्जित कर देते हैं। इसके अलावा पश्चिम एशिया में तानाशाहियों के विरुद्ध जिस नए वसंत का अवतरण हुआ था, इस तरह की घटनाओं से उस पर भी ग्रहण लगना शुरू हो गया है। जो बगावत खुली हवा में सांस लेने के लिए शुरू हुई थी और जिसका नेतृत्व आगे-देखू नौजवान पीढ़ी के हाथ में था, वह अब मजहबी जुनून के कारण पश्चिम एशिया को मध्ययुगीन काल-कोठरी में कैद होने के मार्ग पर बढ़ती हुई दिखाई पड़ रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस्लामी देशों के इतिहास में यह एक अस्थायी और सतही दौर साबित होगा।



लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।
dr.vaidik@gmail.com
 
 
 

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